भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १६ ॥ ४५१ वह ही [ सूर्य ] लोक तीसरा सवन है। ( तस्य पञ्च दिशः, तृतीयसवनस्य पञ्च उक्थानि ) उस [ सूर्य लोक ] की पांच दिशायें [ पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और एक ऊपर नीचे की दिशा ] हैं और तीसरे सवन के पांच उक्थ [ समवती, मद्वती, सुतवती, पीतवती और अभिरूपा ऋचाओं वाले स्तोत्र ] हैं। ( सः एतैः पञ्चभिः उक्थैः, एताः पञ्चदिशः आप्नोति ) वह [ यजमान ] इन पांच प्रकार वाले स्तोत्रों से इन पांच दिशाओं को पाता है। ( तत् यत् एषां लोकानां रूपं या मात्रा ) क्योंकि वह इन लोकों का रूप [ आकार ] है जो मात्रा [ परिमाण ] है। ( तेन रूपेण तया मात्रया इमान् लोकान् ऋध्नोति, इमान् लोकान् ऋध्नोति इति ) उस ही रूप [ आकार ] से और उस मात्रा [ परिमाण ] से इन लोकों को वह समृद्ध करता है, इन लोकों को वह समृद्ध करता है [ अवश्य समृद्ध करता है ] ॥ १८ ॥ भावार्थः-मनुष्यों को योग्य है कि देश और काल का विचार करके कार्य करें जिससे उन्हें सफलता प्राप्त हो ॥ १८ ॥ विशेषः १-( शस्रं ) के स्थान पर ( शस्त्रं ) ठीक है, और ( सरस्वतायै ) के स्थान पर ( सरसतायै ) ऐ० ब्रा० ६ । १२ से शुद्ध किया है ॥ विशेषः २-इस कण्डिका को प्रातःसवन में गो० उ० ३ । १६ और माध्यन्दिन सवन में उ० ४ । ४ से मिलाओ और वहां पर ही प्रयोजनीय मन्त्र हैं ॥ कण्डिका १९ ॥ तदाहुः, किं षोडशिनः षोडशित्वं षोडश स्तोत्राणि षोडश शस्त्राणि षोडशभिरक्षरैरादत्ते, द्वे वा अक्षरे अतिरिच्येते, षोडशिनोऽनुष्टुभमभिसम्पन्नस्य । वाचो वा एतौ स्तनौ, सत्यानृते वाव ते, अवत्येनं सत्यम् नैनमनृतं हिनस्ति, य एवं वेद ॥ १९ ॥ इत्यथर्ववेदस्य गोपथब्राह्मणस्य चतुर्थः प्रपाठकः समाप्तः ॥ ४ ॥ कण्डिका १९ ॥ एकाह यज्ञ में षोडशी शब्द की व्याख्या ॥ ( तत् आहुः, षोडशिनः किं षोडशित्वम् ) वे कहते हैं-षोडशी [ सोलह अङ्ग वाले यज्ञ ] का क्या षोडशित्व [ सोलहपन ] है? [ इस का समाधान ] ( षोडश स्तोत्राणि षोडश शस्त्राणि षोडशभिः अक्षरैः आदत्ते ) सोलह स्तोत्रों और सोलह शस्त्रों को [ आधे आधे अनुष्टुप् छन्द के ] सोलह अक्षरों से वह [ अध्वर्युं ] ग्रहण करता है। ( अनुष्टुभम् अभिसम्पन्नस्य षोडशिनः द्वे अक्षरे वै अतिरिच्येते ) अनुष्टुप् रखने वाले षोडशी [ स्तोत्र ] के दो दो अक्षर बढ़ जाते हैं [ आधे अनुष्टुप् के १६ अक्षरों के आदि और अन्त में ओम् शब्द बोलने से १८ अक्षर होते हैं-इस का समाधान ] । —इनच् = एनच् । अविनाय । रक्षकाय ( अन्तरयाम ) गो० उ० ३ । १६ । अन्त- र्याति । अन्तरेण गच्छति । अन्यद् गतम्--गो० उ० ३ । १६ ॥ १९--( आदत्ते ) गृह्णाति ( अतिरिच्येते ) अधिके भवतः ( अभिसम्प-