भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 506

४६८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ७ ( सर्वेषां वेदानाम् एष रसेन तत् अभिषिञ्चति ) सब ही वेदों के रस से तब वह [ यज- मान को ] अभिषेक करता है । ( बृहत्यां गायन्ति ) बृहती [ बड़े विषय वाली वेद विद्या वा बृहती छन्द ] में वे [ साम ] गाते हैं । ( बृहत्यां वै असौ आदित्यः श्रियां प्रतिष्ठा- याम् प्रतिष्ठितः तपति ) बृहती [ बड़े विषय वाली वेद वाणी ] में ही वह चमकने वाला सूर्य शोभा और प्रतिष्ठा में ठहरा हुआ तपता है । ( ऐन्द्र्यां बृहत्यां गायति ) इन्द्र [ परमेश्वर ] देवता वाली बृहती [ वेदवाणी ] में वह [ साम ] गाता है । ( ऐन्द्रः वै एषः यज्ञक्रतुः यत् सौत्रामणिः ) इन्द्र देवता वाला ही यह यज्ञ कर्म है जो सौत्रामणी [ सुत्रामा बड़े रक्षक इन्द्र परमेश्वर देवता वाली इष्टि ] है । ( ऐन्द्रायतनः एषः, एतर्हि यः यजते, स्वे एव आयतने एनं तत् प्रीणाति ) इन्द्र देवता वाले आश्रय से युक्त यह [ यजमान ] है जो अब यज्ञ करता है, अपने ही आश्रय में इस [ यजमान ] को तब वह [ इन्द्र ] प्रसन्न करता है ॥ ( अथ कस्मात् संश्यानानि नाम, एतैः वै सामभिः. देवाः इन्द्रम् इन्द्रियेण वीर्येण समश्यन्, तथा एव एतत् यजमानाः एतैः एव सामभिः इन्द्रियेण एव वीर्येण संश्यन्ति ) फिर किसलिये संश्यान [ आपस में मिले हुये साम ज्ञान ] प्रसिद्ध हैं । [ उत्तर ] इन ही सामज्ञानों से विद्वानों ने इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले जीव ] को इन्द्रपन [ ऐश्वर्य ] और वीर्य [ पराक्रम ] के साथ अच्छे प्रकार तीक्ष्ण किया है वैसे ही अब यजमानों को इन ही साम ज्ञानों से ऐश्वर्य और पराक्रम के साथ वे सब प्रकार तीक्ष्ण करते हैं । ( संश्रवसे विश्रवसे सत्यश्रवसे श्रवसे इति सामानि भवन्ति ) संश्रव [ अच्छे प्रकार अन्न, धन और यश ] के लिये, विश्रव [ विविध अन्न धन और यश ] के लिये, सत्यश्रव [ सत्य अन्न धन और यश ] के लिये और श्रव [ सामान्यतः अन्न धन और यश ] के लिये यह सामज्ञान होते हैं । ( एषु एव लोकेषु एनं प्रतिष्ठापयति ) इन ही लोकों में इस [ यजमान ] को वह प्रतिष्ठित करता है । ( चतुः निधनं भवति, चतस्रः वै दिशः, दिक्षु तत् प्रतितिष्ठन्ते ) चार बार निधन [ अन्तिम यज्ञ कर्म ] होता है, चार ही दिशायें हैं, दिशाओं में तब वे प्रतिष्ठा पाते हैं । ( अथो चतुष्पादः पशवः, पशूनाम् आप्त्यै ) फिर चार पांव वाले पशु हैं, पशुओं की प्राप्ति के लिये [ साम है ] ॥ ( बृहत्याम् ) बृहद्विषयायां वेदवाण्याम् ( सौत्रामणिः ) सर्वधातुभ्यो मनिन् ( उ० ४ । १४५ ) सु+त्रैङ् पालने-मनिन् । साऽस्य देवता ( पा० ४ । २ । २४ ) सुत्रामन्—अण्, टिलोपो न, ङीप्, अत्र पुंलिङ्गः । सौत्रामणी । महारक्षकयोग्या भक्तिः । इष्टिविशेषः (ऐन्द्रायतनः) इन्द्रदेवताकस्याश्रययुक्तः (संश्यानानि) सम्+श्यैङ् गतौ-क्तः । संगतानि सामानि ( समश्यन् ) शो तनूकरणे—लङ् । सम्यक् तीक्ष्णीकृतवन्तः ( यजमानाः ) यजमानान् ( संश्यन्ति ) सम्यक् तीक्ष्णीकुर्वन्ति ( संश्रवसे ) श्रु श्रवणे—असुन् । श्रवः=अन्नम्—निघ० २ । ७, धनम्—२ । १० । सम्यग् अन्नस्य धनस्य यशसो वा प्राप्तये ( चतुः ) चतुर्वारम् ( निधनम् ) अन्तिमयज्ञकर्म ( साम्नः ) सामन्