गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 525, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुज्यते ) सामर्थ्यं वाला ही यह बहुत ऋचायें जानने वाला है जो अच्छावाक है और वह वह्नि [ बोझ ले चलने वाले ] के बोझों को ही ले जाता है, जिन [ बोझों ] में वह जोड़ा जाता है । ( तस्मात् अच्छावाकः वह्निवत् एतत् सूक्तम् उभयत्र शंसति, सः पराक्षु च एव सर्वाक्षु च आह इति ) इसलिये अच्छावाक वह्निवत् [ वह्नि शब्द वाले ] इस सूक्त को दो जगह बोलता है, [ अर्थात् ] आवृत्ति रहित [ चतुर्विंश आदि यज्ञों ] में और भी आवृत्ति वाले [ षडह आदि यज्ञों ] में बोलता है । ( तानि पञ्चसु अहःसु शस्यन्ते, चतुर्विंशे अभिजिति विषुवति विश्वजिति महाव्रते तानि एतानि अहीनसूक्तानि इति आचक्षते हि एषु किंचन न हीयते ) वे [ सूक्त ] पाँच दिन [ यज्ञों ] में बोले जाते हैं, [ अर्थात् ] चतुर्विंश में, अभिजित् में, विषुवान् में, विश्वजित् में और महाव्रत में, वे ही यह अहीन [ बहुत दिन रहने वाले वा हीनता रहित यज्ञ के ] सूक्त हैं—ऐसा कहते हैं, क्योंकि इन [ सूक्तों ] में कुछ भी [ अङ्ग ] नहीं छोड़ा जाता है। (पराञ्चि ह वै एतानि अहानि अभ्यावर्तीनि भवन्ति ), आवृत्ति रहित ही यह दिन आवृत्ति वाले होते हैं । (तस्मात् एतानि एतेषु अहःसु शस्यन्ते ) इसलिये यह [ सूक्त ] इन दिनों में बोले जाते हैं । ( यत् एतानि शंसन्ति, तत् स्वर्गस्य लोकस्य रूपम् ) जो वे इनको बोलते हैं, वह स्वर्ग लोक का रूप [ चिह्न ] है । ( यत् उ एव एतानि शंसति [ शंसन्ति ] इन्द्रम् एव निह्वयन्ते, यथा ऋषभं वासितायै ) जो ही इन [ सूक्तों ] को वे बोलते हैं, इन्द्र को ही इनसे वे बुलाते हैं, जैसे गतिमान् [ पुरुषार्थी वीर ] को निवास करायी हुई प्रजा के लिये [ बुलाते हैं ] [ ऐ० ब्रा० ६ । १८ ] ॥ ( ते वै देवाः च ऋषयः च अब्रुवन्, समानेन यज्ञं सन्तन्वामहै इति ) वे ही देव [ विजयी पुरुष ] और ऋषि लोग [ दूरदर्शी पुरुष ] बोले—एक से विधान से यज्ञ को हम फैलावें । ( तत् एतत् यज्ञस्य समानम् अपश्यत् [ अपश्यन् ], समानां प्रगाथां समानीः प्रतिपदः समानानि सूक्तानि ) सो यह ही यज्ञ के एक से विधान को उन्होंने देखा—अर्थात् एक सी प्रगाथा को, एक सी आरम्भणीया ऋचाओं को और एक से सूक्तों को । ( ओकःसारी वै इन्द्रः, यत्र वै इन्द्रः पूर्वं गच्छति तत्र यज्ञस्य एव सेन्द्रतायै अपरम् एव गच्छति ) घर घर पहुँचने वाला ही इन्द्र है जहाँ ही इन्द्र पहिले घर जाता है, वहाँ यज्ञ में इन्द्र सहित विद्यमानता के लिये दूसरे [ घर ] भी जाता है [ ऐ० ब्रा० ६ । १७ ] ॥ १५ ॥ सर्व—अञ्चु गतिपूजनयोः—क्विन् । सर्वम् अञ्चति गच्छतीति सर्वाक् । आवृत्तिसहितेषु षडहगतेषु अहःसु ( वीर्यवान् ) शक्तिमान् ( बह्वृचः ) बह्वीनाम् ऋचामध्येता ( धुरः ) भारान् ( हीयते ) त्यज्यते ( पराञ्चि ) आवृत्तिरहितानि ( अभ्यावर्तीनि ) आवृत्तिसहितानि ( ऋषभम् ) ऋषिवृषिभ्यां कित् ( उ० ३ । १२३ ) ऋष गतौ दर्श- ने च--अभच्, कित् । गतिमन्तं पुरुषार्थिनम् ( वासितायै ) वस निवासे—णिच् - क्तः, टाप् । निवासितायै प्रजायै ( समानेन ) सदृशेन विधानेन ( प्रतिपदः ) आरम्भणीया ऋचः ( ओकःसारी ) गृहेषु सञ्चरणशीलः ( सेन्द्रतायै ) इन्द्रेण सह वर्तमानतायै ॥