भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 558

५२० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० ६ मन्त्रों [ ऋ० ६ । २० । १-१३ जिसके दूसरे मन्त्र में विष्णु शब्द है और जो इन्द्र देवता वाला है ] बोले । ( अथ त्वम् होतुः [ होत : ] उपरिष्टात् या रौद्रिया धाय्या, अस्य मारुतस्य सूक्तस्य पुरस्तात् अपि धाः इति ) और तू हे होता ! अन्त में जो रुद्र देवता वाली धाय्या है, [ उसको ] इस मारुत सूक्त के पहिले ही धारण कर । ( तथा इति ) । [ बुडिल बोला ] वैसा ही हो । ( तत् अपि एतर्हि तथा एव शस्यते, यथा षष्ठे पृष्ठयाहनि ) वह अब भी वैसा ही बोला जाता है, जैसे पृष्ठयाह यज्ञ के छठे दिन ॥ ( यज्ञः एव कल्पते, यजमानस्य प्रजापतिः कल्पते, कथम् अत्र नाभानेदिष्ठः अशस्तः एव भवति ) यज्ञ ही समर्थ होता है और यजमान का प्रजापालक व्यवहार समर्थ होता है, कैसे यहां नाभानेदिष्ठ स्तोम बिना बोला हुआ ही रहता है । ( अथ बालखिल्याः शंसति, रेतः वै अग्रे अथ प्राणाः, एवं ब्राह्मणाच्छंसी [ ब्राह्मणाच्छंसिना ] नाभानेदिष्ठः अशस्तः एव भवति ) फिर वह बालखिल्य ऋचायें बोलता है, वीर्य ही पहिले है फिर प्राण हैं, इस प्रकार ब्राह्मणाच्छंसी करके नाभानेदिष्ठ स्तोम बिना बोला हुआ ही होता है । ( अथ वृषाकपिं शंसति, रेतः वै अग्रे अथ आत्मा, कथम् अत्र यजमा- नस्य प्रजापतिः कथं प्राणाः अवरुद्धाः भवन्ति इति ) फिर वृषाकपि [वृषाकपि वाले स्तोम] को वह बोलता है, वीर्य ही पहिले फिर आत्मा होता है, कैसे यहाँ यजमान का प्रजापालक व्यवहार [ समर्थ होता हैं ], और कैसे प्राण रक्षित होते हैं । ( यजमानं वै एतेन सर्वेण यज्ञक्रतुना संस्कुर्वन्ति, यथा सः गर्भः योन्याम् अन्तः एव सम्भवन् शेते ) [ उत्तर ] यज- मान को ही इस सब यज्ञ कर्म से वे संस्कार युक्त करते हैं, जैसे गर्भ गर्भाशय के भीतर ही उत्पन्न होता हुआ रहता है । ( सर्वं सकृत् एव अग्रे न ह वै सम्भवति, एकैकं वा अङ्गं सम्भवति ) सब एक बार ही पहिले नहीं समर्थ होता, एक एक ही अङ्ग समर्थ होता है । ( सर्वाणि चेत् समाने अहनि क्रियेरन्, यज्ञः एव कल्पते, यजमानस्य प्रजापतिः कल्पते ) जो सब [शिल्प स्तोत्र] एक दिन में किये जावें, यज्ञ अवश्य समर्थ होता है, और यजमान का प्रजापालक व्यवहार समर्थ होता है । ( अथ ह एव एवयामरुतं होता शंसेत्, तस्य अस्य प्रतिष्ठा, तस्यै एव एनम् अन्ततः प्रतिष्ठापयति प्रतिष्ठापयति ) फिर ही एवयामरुत् स्तोम को होता बोले, उस [ यजमान ] की प्रतिष्ठा है, उस [ प्रतिष्ठा ] के लिए ही इस [ एवयामरुत् स्तोम ] को अन्त में वह स्थापित करता है, वह स्थापित करता है ॥ ६ ॥ भावार्थः-मनुष्य यज्ञ के अङ्ग अङ्ग के विचार के साथ यज्ञ सिद्धि करके प्रतिष्ठा पावे ॥ ६ ॥ विशेषः १-इस कण्डिका के लिये देखो पीछे क० ७ । ८ और ऐ० ब्रा० ५ । १५ और ६ । ३०, ३१ ॥ विशेषः २-संकेतित मन्त्रों में से दो मन्त्र यहाँ लिखते हैं, शेष वेद में देखो-द्यौर्न य इन्द्राभि भूमार्यस्तस्थौ रयिः शवसा पृत्सु जनान् । तं नः सहस्र- हे होतः ( धाः ) अधाः । धेहि ( प्रजापतिः ) प्रजातिः । जन्म ( अवरुद्धाः ) रक्षिताः ( संस्कुर्वन्ति ) संस्कारयुक्तं कुर्वन्ति ( योन्याम् ) गर्भाशये ( सम्भवन् ) उत्पन्नः सन् ( शेते ) वर्तते ( कल्पते ) समर्थयते ॥