गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें१७ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ८ ॥ [ सर्वव्यापक ] ( ऋषीन् ) ऋषियों [ सन्मार्ग दर्शक वेद ज्ञानों ] को (निर्-अमिमत) बनाया। ( तान् विंशिनः ) उन बीसवें से सम्बन्ध वाले ( अङ्गिरसः ) अङ्गिरा [ सर्वव्यापक ] ( ऋषीन् ) ऋषियों [ वेद ज्ञानों ] को ( अभि अश्राम्यत् ) उस [ ब्रह्म ] ने सब ओर से दबाया, ( अभि अतपत् सम् अतपत् ) सब ओर से तपाया, भली भांति तपाया । ( तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः संतप्तेभ्यः ) उन दबाये हुए, तपाये हुये, भली भांति तपाये हुये [ बीसों ] से ( दशतयान् ) दस प्रकार वाले ( आङ्गिरसान् ) अङ्गिरा [ व्यापक ब्रह्म ] से आये हुये ( आर्षेयान् ) आर्षेयों [ ऋषियों, वेद मन्त्रों में विख्यात सूक्ष्म विज्ञानों ] को (निर् अमिमत ) उस [ ब्रह्म ] ने बनाया, [ अर्थात् ] ( षोडशिनः ) सोलहवें [ प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, प्रकाश, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, अन्न वीर्य, तप मन्त्र, कर्म, लोक इन पन्द्रह कलाओं के सहित सोलहवीं कला के नाम ] से सम्बन्ध वाले ( अष्टादशिनः ) अठारहवें [ धैर्य, सहन, मन का रोकना, चोरी न करना, शुद्धता, जितेन्द्रियता बुद्धि, विद्या, सत्य, क्रोध न करना, यह दस धर्म, तथा ब्राह्मण, गौ, अग्नि, सुवर्ण, घृत, सूर्य, जल इन सात मंगलों के सहित अठारहवें राजा ] से सम्बन्ध वाले, ( द्वादशिनः ) बारहवें [ चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, मघ इन ग्यारह महीनों के सहित फाल्गुन महीने ] से सम्बन्ध वाले, ( एक-ऋचाम् ) एक [ ओ३म् परमात्मा ] की स्तुति योग्य, ( तृचान् ) तीन [ भूत, भविष्यत्, वर्तमान ] की स्तुति योग्य विद्या वाले ( चतुर्-ऋचान् ) चार [ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ] की स्तुति योग्य विद्या वाले ( पञ्च-ऋचान् ) पाँच [ पृथिवी, बल, तेज, वायु, आकाश ] तत्त्वों की स्तुति योग्य विद्या वाले, ( षट् ऋचान् ) छह [ वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त, शिशिर ऋतुओं ] की स्तुति योग्य विद्या वाले, ( द्वि-ऋचान् ) दो [ स्थावर और जङ्गम संसार ] की स्तुति योग्य विद्या वाले, ( सप्त- ऋचान् ) सात [ दो कान, दो नथने, दो आंख, एक मुख—अथर्व० १० । २ । ६ ] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ इन सूक्ष्म विज्ञानों को बनाया ! ] । ( तान् ) उन ( अङ्गिरसः ) अङ्गिरा [ सर्वव्यापक ] ( ऋषीन् ) ऋषियों [ सन्मार्ग दर्शक वेद ज्ञानों ] को ( च ) ओर ( आङ्गिरसान् ) आङ्गिरस अर्थात् अङ्गिरा [ व्यापक ब्रह्म ] से आये हुये ( आर्षेयान् ) आर्षेयों [ ऋषियों वेद मन्त्रों में विख्यात सूक्ष्म विज्ञानों ] को ( अभि अश्राम्यत् ) उस [ ब्रह्म ] ने सब ओर से दबाया, ( अभि अतपत् ) सब ओर से तपाया, ( सम् अतपत् ) भली भांति तपाया । ( तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यः ) उन दबाये हुये, तपाये हुये, भली भांति तपाये हुये [ बीसों ] से ( यान् ) जिन ( मन्त्रान् ) मन्त्रों [ अति सूक्ष्म विज्ञानों ] को ( अपश्यत् ) उस [ ब्रह्म ] ने देखा, ( सः ) वह ( आङ्गिरसः ) आङ्गिरस ( आङ्गिरसान् ) तत आगतः ( पा० ४ । ३ । ७४ ) अङ्गिरस्—अण् । अङ्गिरसः सर्वव्यापकात् परमेश्वराद् आगतान् प्राप्तान् । ( आर्षेयान् ) क० ७ । ऋषिषु वेद- मन्त्रेषु विख्यातानि सूक्ष्मविज्ञानानि (षोडशिनः) षड् + दशन्—डट् पूरणेऽर्थे तत इनिः। प्राणादिपंचदशकलासहितस्य सम्बद्धान् ( जनत् ) वत॑मपि पृथ॒ग्वृह॒न्मह॒ज्- जग॒च्छतृ॑वज्ज ( ह० २ । ८४ ) जव जनने—अतिः। सर्वजनयितृ ब्रह्म । ( द्वैतम् )