भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 600 में से

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पृष्ठ 573

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १७ ॥ ५४५ यथा आभिः ह वै देवाः असुराणां रसान् प्रववृहुः, तस्मात् प्रवह्निकाः, तत् प्रवह्निकानां प्रवह्निकात्वम् ) सो जैसे इन [ ऋचाओं ] से ही विद्वानों ने असुरों के रसों को उखाड़ दिया, इसलिये यह प्रवह्निका [ चलायमान करने वाली ऋचायें ] हैं—यही प्रवह्निकाओं का प्रवह्निकापन है । ( ताः वै प्रतिराधैः प्रत्यराघ्नुवन् ) उन [ऋचाओं] ने ही प्रतिराध मन्त्रों से [ असुरों के पराक्रमों को ] हटा दिया । ( तत् यत् प्रतिराधैः प्रत्यराघ्नुवन्, तस्मात् प्रतिराधाः, तत् प्रतिराधानां प्रतिराधत्वम् ) सो जो प्रतिराध मन्त्रों से हटा दिया, इसलिये वे प्रतिराध मन्त्र हैं, यह ही प्रतिराध मन्त्रों का प्रतिराधपन है । ( प्रवह्निकाभिः एव द्विषतां भ्रातृव्याणां रसान् प्रवह्निकाः, ताः वै प्रतिराधैः प्रतिराघ्नुवन्ति, ताः प्रग्राहम् इति एव ) प्रवह्निका ऋचाओं से ही अप्रिय वैरियों के पराक्रमों को वे चलायमान करने वाली ऋचायें ही प्रतिराध मन्त्रों से हटा देती हैं, उनको पाद पाद करके [ वह बोलता है ] ॥ ( अथ आजिज्ञासेन्याः शंसति, इहेत्थ प्रागपागुदगधरागिति ) फिर आजिज्ञासेन्याओं [ शत्रुओं का तिरस्कार करने वाली ऋचाओं ] को वह बोलता है— इहेत्थ प्रागपागुदगधराक् इति" अथ० २० । १३४ । १-४, यह मन्त्र है । ( आजिज्ञासेन्याभिः ह वै देवाः असुरान् आज्ञाय अथ एनान् अत्यायन् तथा एव एतत् यजमानाः आजिज्ञासेन्याभिः एव अप्रियं भ्रातृव्यम् आगाय अथ एनम् अतियन्ति । ) आजिज्ञासेन्या ऋचाओं से ही विद्वानों ने असुरों को तिरस्कार करके फिर उनको उल्लंघन किया; वैसे ही अब यजमान लोग आजिज्ञासेन्या ऋचाओं से ही अप्रिय वैरी पर चढ़कर फिर उसको उल्लंघन करते हैं । ( ताः अर्धर्चशः प्रतिष्ठित्यै एव शंसति ) उन [ ऋचाओं ] को आधी आधी ऋचाओं से प्रतिष्ठा के लिये वह बोलता है ॥ ( अथ अतिवादं शंसति, वी३मे देवा अक्रंसत इति ) फिर वह अतिवाद [ शत्रुओं के अधिक्षेप अर्थात् घुड़कने वाले मन्त्र ] को वह बोलता है—वी३मे देवा अक्रंसत इति..... अथर्व० २० । १३५ । ४, यह वह मन्त्र है । ( श्रीः वै अतिवादः, तम् एकर्चं शंसति ) श्री ही [ सम्पत्ति का हेतु ] अतिवाद है । उस एक ऋचा वाले को वह बोलता है । ( एकः ताः [ एका सा ] श्रीः, तां वै विरेभं शंसति, विरेभैः श्रियं पुरुषः वहति इति ) एक ही वह श्री है, उस [ ऋचा ] को विविध ध्वनि से वह बोलता है, विविध प्रतिराधसंज्ञान् मन्त्रान् ( भुक् ) भुज पालनाभ्यवहारयोः—क्विप् । पालकः पर- मात्मा ( अभिगतः ) आभिमुख्येन प्राप्तः ( रसान् ) वीर्याणि ( प्रववृहुः ) वृंहू उद्यमने—लिट् । उद्यतवन्तः । उत्पादितवन्तः ( प्रग्राहम् ) पादेन पादेन गृहीत्वा ( आजिज्ञासेन्याः ) आकारो अत्र अवशब्दार्थे । आजातुमवज्ञातुमिच्छा आजिज्ञासा, तामर्हन्तीति तत् साधनीभूता ऋचः ( इत्थ ) इत्थम् । अनेन प्रकारेण ( प्राक् ) प्राच्यां दिशि ( अपाक् ) प्रतीच्यां दिशि ( उदक् ) उदीच्यां दिशि ( अधराक् ) नीच्यां दक्षिणस्यां दिशि ( आज्ञाय ) अवज्ञातवन्तः ( आगाय ) आभिमुख्येन प्राप्य ( अतिवादम् ) अधिक्षेपम् । तिरस्कारम् । अतिवादाख्यं सूक्तम् ( इमे )

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