गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 574, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें५३६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १३ ध्वनियों से श्री को पुरुष पाता है । (ताम् अर्धर्चशः प्रतिष्ठित्यै एव शंसति ) उसको आधी आधी ऋचा करके प्रतिष्ठा के लिये ही वह बोलता है ॥ १३ ॥ भावार्थः—जो मनुष्य वेदों को विचार कर प्रयत्न के साथ वैरियों को निर्बल करते हैं, वे ही श्रीमान् होते हैं ॥१३॥ विशेषः १—इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ६ । ३३ से मिलाओ ॥ विशेषः २—प्रतीक वाले सूक्तों के पहिले पहिले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं । शेष मन्त्र वेद में देखो— कुन्तापसूक्तानि ॥ १, ऐतश सूक्त—एता अश्वा आप्लवन्ते ॥ १ ॥ प्रतीपं प्रति सुत्वनम् ॥२॥ अथ० २० । १२९ । १—२० ॥ (एताः) यह (अश्वाः) व्यापक प्रजाऐं (प्रतीपम्) प्रत्यक्ष व्यापक (सुत्वनम् प्रति) ऐश्वर्य वाले [ परमेश्वर ] के लिये (आ) आकर (प्लवन्ते) चलती हैं ॥ १, २ ॥ २, प्रवह्लिका ऋचायें—विततौ किरणौ द्वौ तावा पिनष्टि पूरुषः । न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे ॥ अथ० २० । १३३ । १—६ ॥ (द्वौ) दोनों (किरणौ) प्रकाश की किरणें [ शारीरिक बल और आत्मिक पराक्रम ] (विततौ) फैले हुये हैं, (तौ) उन दोनों को (पूरुषः) पुरुष [ देहधारी जीव ] (आ) सब ओर से (पिनष्टि) पीसता है [ सूक्ष्म रीति से काम में लाता है ] । (कुमारि) हे कुमारी ! [ कामना योग्य स्त्री ] (वै) निश्चय करके (तत्) वह (तथा) वैसा (न) नहीं है, (कुमारि) हे कुमारी ! (यथा) जैसा (मन्यसे) तू मानती है ॥ ३, प्रतिराध सूक्त - भुगित्यभिगतः शल्दित्यपक्रान्तः फलित्यभिष्ठितः । दुन्दुभिमाहननाभ्यां जरितरोथामो दैव ॥ अथ० २० । १३५ । १-३ ॥ (भुक्) पालने वाला [ परमात्मा ] (अभिगतः) सामने पाया गया है—(इति) ऐसा है, (शल्) शीघ्रगामी वह (अपक्रान्तः) सुख से आगे चलता हुआ है—(इति) ऐसा है; (फल्) सिद्धि करने वाला वह (अभिष्ठितः) सब ओर ठहरा हुआ है—(इति) ऐसा है । (जरितः) हे स्तुति करने वाले (दैव) परमात्मा को देवता मानने वाले विद्वान् ! (दुन्दुभिम्) ढोल को (आहननाभ्याम्) दो डंकों से (आ) सब ओर (उथामः) हम उठावें [ बल से बजावें ] ॥ ४, आज्ञासेन्या ऋचायें—इहेत्थ प्रागपागुदगधराग्—अरालागुदभर्त्सथ-- अथ० २० । १३४ । १-४ ॥ (इह) यहाँ (इत्थ) इस प्रकार (प्राक्) पूर्व में, (अपाक्) पश्चिम में, (उदक्) उत्तर में और (अधराक्) दक्षिण में--(अरा- लागुदभर्त्सथ) हिंसा की गति को धिक्कारने वाला परमात्मा है ॥ प्रसिद्धाः (अक्रमत) क्रमु पादविक्षेपे । पादं विक्षिप्तवन्तः । अग्रेगताः (विरेभम्) ध्वनिविशेषम् (वहति) प्राप्नोति ॥