भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० १२ ॥ २५ संस्थम्) [पाँच सूक्ष्मभूत, पाँच स्थूलभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक अन्तःकरण] इन इक्कीस के साथ यथावत् ठहरे हुए (यज्ञम्) यज्ञ [संयोग से बने संसार] को (अपश्यत्) देखा । (तत् अपि) वह भी (एतत् ऋचा) इस ऋग्द्वारा (उक्तम्) बोला जाता है-(अग्निर्यज्ञं त्रिवृतं सप्ततन्तुम् इति) ऋग्वेद १०।५२।४। (अथ अपि) और भी (एषः) यह (प्राक्रोडितः) क्रोडपत्रीय [न्यूनतापूरक] (श्लोकः) श्लोक (प्रति अभिवदति) बोला जाता है-(सप्त स्तुत्याः सप्त च पाकयज्ञा इति) [यह श्लोक आगे है-गो० पू० ५।२५] १२ ॥ भावार्थः-परमात्मा ने अपने सामर्थ्य से सब चन्द्र आदि लोक और सब संसार बनाया है ॥ १२ ॥ विशेषः-(१) पुरुषसूक्त अथर्ववेद १९।६।७। ऋग्वेद १०।९०।१३। और यजुर्वेद ३१।१२। में ऐसा कहा है-चन्द्रमा मनसो जातः....... [इस पुरुष के] मन [मनन सामर्थ्य] से चन्द्रलोक उत्पन्न हुआ, अर्थात् चन्द्रमा से मनन शक्ति और पदार्थ पुष्टि होती है ॥ विशेषः-(२) (अग्निर्यज्ञम्) यह ऋग्वेद १०।५२।४ के उत्तरार्ध की प्रतीक है जो इस प्रकार है "अग्निर्विद्वान् यज्ञं नः कल्पयाति पञ्चयामं त्रिवृतं सप्ततन्तुम्" अर्थात् विद्वान् अग्नि [प्रकाशमान परमात्मा] हमारे लिये (पञ्चयामम्) [प्राण, अपान, व्यान, उदान, और समान इन] पाँच प्राणों से चलने वाले (त्रिवृतम्) [सत्त्व रज और तम इन तीन गुणों से प्रत्येक] तिगुने किये हुये (सप्ततन्तुम्) [तीन काल, तीन लोक अर्थात् सृष्टि स्थिति प्रलय और एक जीवात्मा इन] सात तन्तु [विस्तार] वाले (यज्ञम्) यज्ञ [संयोग से बने हुये संसार] को (कल्पयाति) बनाता है ॥ विशेषः-(३) पुरुषसूक्त अथर्ववेद १९।६।१५, ऋग्वेद १०।९०।१५ और यजुर्वेद ३१।१५। में इस प्रकार वर्णन है-"सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः" सात [तीन काल, तीन लोक अर्थात् सृष्टि स्थिति प्रलय और एक जीवात्मा] इस [संसार रूप यज्ञ] के घेरे [के समान] थे, और तीन बार सात [इक्कीस अर्थात् पाँच सूक्ष्मभूत, पाँच स्थूलभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक अन्तःकरण] समिधायें किये गये हैं ॥ विशेषः-(४) "सप्त स्तुत्याः सप्त च......." यह श्लोक आगे है। गोपथ पू० ५। २५ वहीं इसका अर्थ किया जायगा ॥ जीवात्मभिश्च सह विस्तारवन्तम् (एकविंशतिसंस्थम्) पञ्च सूक्ष्मभूतानि पञ्च स्थूलभूतानि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि, एकम् अन्तःकरणं चेति, एभिः सह सम्यक् स्थितम् (यज्ञम्) यजयाचयत० (पा० ३।३।६०) यज देवपूजा- सङ्गतिकरणदानेषु-नङ् । संगत्या संयोगेन कृतं संसारम् (प्राक्रोडितः) प्र-आङ् + क्रुड निमज्जने-क्तः । अङ्के गतः । क्रोडपत्रीयः । न्यूनतापूरकः ॥