गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४ ) गोरक्षशतकम् का प्रस्तुत संस्करण जिसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है, वह लोनावाला-संस्करण के आधार पर है, इसका सम्बन्ध गोरखनाथ मन्दिर वाले संस्करण से नहीं हैं इसका हिन्दी अनुवाद किया है- डॉ. मोतीलाल खड्डर शास्त्री (मास्टरजी) ने, जो पीताम्बरापीठ, दतिया से जुड़े हैं यह अनुवाद मूल से यथासंभव सम्बद्ध है इसलिये मूल पाठ को समझने के लिये बहुत अच्छा और बहुत उपयोगी हैं यह टीका या व्याख्या नहीं है, इसमें बहुत विस्तार की आवश्यकता होती है। पहली अपेक्षा होती है मूल से परिचित होने की जिसके लिये मूल से सम्बद्ध अनुवाद अपेक्षित है और विस्तार का द्वार तो कई माध्यमों से खुला रहता है। गोरक्षशतकम् में योग और तंत्र के साधनों का सामञ्जस्य है। इसमें तंत्र के कतिपय योगपरक साधन समाहित हैं अजपाजप और कुण्डलिनी योग वस्तुतः तंत्र की ओर से आये साधन हैं तंत्र और योग में आरम्भ से सामीप्य है जहां भेद करना कठिन होता है जो साधना की पुष्टि की दृष्टि से उत्तम संकेत है। गोरखनाथ का योग जो हठ योग के रूप में भी विकसित हुआ, तंत्रयोग के आधार पर हुआ, यह असंदिग्ध है। गोरक्षशतक में योग के छः अंग माने गये हैं जो आसन से आरम्भ होकर समाधि तक हैं। इसका कारण संभवतः यह है कि विधि रूप में क्रियात्मकता यहीं से आरम्भ होती है। इसका यह अर्थ नहीं कि गोरखनाथ पंतजलि के यम- नियम से अपरिचित है या उसकी मान्यता नहीं देते। सिद्धसिद्धान्त पद्धति में उन्होंने कहा है - यम इति उपरामः सर्वेन्द्रियजयः नियम इति मनोवृत्तीनां नियमनम्- सभी इन्द्रियों का अपने विषयों से हट जाना यम है तथा मन की सभी वृत्तियों का नियमन होना यम है। यम-नियम की उनकी यह परिभाषा बहुत सारगर्भित है, उसके आचारात्मक रूप की अपेक्षा यह अधिक योगपरक है। इसका सीधा सम्बन्ध उसके तात्पर्य से है। इसी तरह उन्होंने वहीं पर आसन से लेकर समाधि तक को तात्पर्यार्थ रूप में परिभाषित किया है।