भारतकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

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( १३ ) है कि गोरक्षपद्धति और गोरक्षशतक गोरखनाथ द्वारा प्रतिपादित योग का प्रामाणिक ग्रन्थ है। गोरक्षशतक की जो पाण्डुलिपियाँ विभिन्न ग्रन्थागारों में उपलब्ध हैं वे सभी छपी भी नहीं है। मुझे दो छपी प्रतियाँ देखने को मिली हैं। एक स्वामी कुवलयानन्द जी द्वारा सम्पादित लोनावाला से छपी है और दूसरी श्री रामलाल श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित गोरखमन्दिर गोरखपुर से छपी है। स्वामी कुवलयानन्द जी योग के अन्वेषक प्रकृति के व्यक्ति थे, जिन्होंने योग से सम्बन्धित कई पुस्तकें प्रकाशित की और हठयोग के मूलग्रन्थ भी प्रकाशित किए। उनके द्वारा स्थापित संस्था लोनावाला में आज भी काम कर रही है। स्वामी कुवलयानन्द जी का गोरक्षशतक का संस्करण समीक्षात्मक है जिसमें पाठ-भेदों का उल्लेख किया गया है। पाठ भेदों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है। पुरानी पुस्तकों में पाठ- भेद हो जाना अस्वाभाविक नहीं है, किन्तु ये पाठ-भेद अर्थ-भेद उत्पन्न नहीं करते। श्री रामलाल श्रीवास्तव गोरखनाथ के साहित्य के अधीत व्यक्ति है और गोरखनाथ पर उनकी पुस्तक भी है। वे गोरखनाथ मन्दिर से प्रकाशित होनेवाली योगवाणी पत्रिका के सम्पादक भी है। उनका गोरक्ष शतक का संस्करण समीक्षात्मक तो नहीं है किन्तु किसी एक पाण्डुलिपि का हू-ब-हू रूप है और शुद्ध भी है। संभव है, गोरखनाथ मन्दिर की परम्परा में यह प्रति उपलब्ध रही हो। गोरखपीठाधीश्वर स्वामी अवेधनाथजी महाराज की दृष्टि में यह संस्करण प्रामाणिक है, क्योंकि उन्होंने अपनी भूमिका में इसी का आधार लिया है और इसके मूल से पर्याप्त उद्धरण दिए है। दोनों संस्करणों में श्लोकों की संख्या एक सौ एक है, किन्तु मुख्य भेद यह है कि पचास से अधिक श्लोक एक दूसरे से भिन्न हैं अर्थात् एक दूसरे में नहीं हैं। गोरखनाथ मन्दिर वाले संस्करण में अजपाजप का बहुत अच्छा प्रतिपादन है, किन्तु लोनावाला संस्करण में यह बिल्कुल नहीं है। लोनावाला संस्करण में पंचमहाभूत धारणा का सुन्दर प्रतिपादन है जो गोरखनाथ मन्दिर वाले संस्करणों में नहीं है। ऐसे ही कुछ और अन्तर है। वैसे दोनों संस्करणों में गोरखनाथ की योग पद्धति से असम्बन्ध कुछ नहीं हैं। सभी विषय सम्बन्ध है, किन्तु विषयगत और प्रतिपादनगत थोड़े अन्तर के कारण एक दूसरे में एक अभाव की प्रतीति अवश्य होती है।