भारतकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

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( १२ ) प्रस्तुति गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) भारत के एक बहुत महान योगी थे, इतने महान कि उन्हें शिव-रूप ही माना जाता था। ऐसा मानना हमारे देश में आदर और सम्मान देने का एक तरीका है। उनके गुह मत्स्येन्द्रनाथ थे। उनकी प्रतिष्ठा और उनका अवदान ऐसा था कि उनके नाम से योगियों का एक एक सम्प्रदाय- नाथ-सम्प्रदाय-चल पड़ा जिसकी परम्परा आज भी मौजूद है। उनकी एक साधना पद्धति है जो उनकी गुह-परम्परा में निहित है। साधना, पुस्तकों को देखकर होती भी नहीं, क्योंकि पुस्तकें प्रायः सांकेतिक होती हैं और उनमें विशेषतः सिद्धान्तों का प्रतिपादन होता है। दूसरी बात यह कि साधना में दीक्षा की आवश्यकता होती है और उस परम्परा की विधियों को भी सीखना होता है। फिर भी पुस्तके सहायक होती है। एक तो उनसे उनके सिद्धान्त, लक्ष्य और साधन तथा दृष्टिकोण का पता चलता है, दूसरे उनके अवदान की जानकारी के साथ अन्य साधना-पद्धतियों के साथ तुलना में भी सहायता मिलती है। गोरखनाथ की रचनाओं से नाथ सम्प्रदाय की योग-साधना पद्धति को स्थायित्व मिला और वह सुरक्षित भी

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