भारतकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

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( ११ ) धारणा तत्त्व का जैसा सुन्दर विवेचन गोरक्षशतकम् में है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। योग वस्तुतः इस जगत्प्रपञ्च का तत्त्वज्ञान है। निरातंकं निरालम्बं निष्प्रपंचं निराश्रयम्। निरामयं निराकारं तत्त्वं तत्त्वविदो विदुः॥ जगत प्रपञ्च में रहते हुये भी गुरुकृपा से प्राप्त योग मार्ग का आश्रय लेकर पञ्चतत्व प्रपञ्च का निरास करते हुये योगी सर्वत्र परमेश्वरान्वीक्षा का स्वभाव विकसित कर लेता है। न गंधं न रसं रूपं न स्पर्शं न च निःस्वनम्। आत्मानं न परं वेत्ति योगी युक्तः समाधिना॥ ऐसी सिद्धावस्था में पहुँचते ही योगी जीवन्मुक्त हो जाता है- खाद्यते न च कालेन बाध्यते न च कर्मणा। साध्यते न च केनापि योगी युक्तः समाधिना॥ यही अद्वैत की चरम अनुभूति है- दुग्धे क्षीरं घृते सर्पिरग्नौ वह्नि रिवार्पितः। अद्वयत्वं व्रजेन्नित्यं योगवित् परमे पदे॥ योगशतक की भाषा चाहे वह मूल संस्कृत हो या मास्टरजी के द्वारा किया गया भाषानुवाद दोनों ही हृदयहारी है। ऐसे लघुकाय ग्रन्थों की आज मानव समाज को बड़ी आवश्यकता है। आज के युग में जब योग “योगा” बन गया है, योग के कतिपय आसनों का प्रदर्शन करके केवल और केवल धन कमाया जा रहा है, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का उपदेश मात्र इसलिये किया जा सकता है कि भोग की क्षमता बढ़ाई जा सके तब ऐसे समय में जीव और ब्रह्म की एकात्मता को सिद्ध करनेवाले, योग के परम प्रतिपाद्य अद्वैत सिद्धि को देनेवाले गोरक्षशतकम् जैसे ग्रन्थों की महनीय आवश्यकता है। मैं एक बार पुनः आचार्य श्री मोतीलालजी खड्डर शास्त्री (मास्टरजी) को प्रणाम करता हूँ और उन्हें इस ग्रन्थ के अनुवाद के लिए बधाई देता हूँ। यह ग्रन्थ पाठकों और साधकों का पथ प्रदर्शक बने, यही मेरी शुभकामना है। गणेशचतुर्थी भगवच्चरणाश्रित १ सितम्बर २०११ ई. 'प्रणव' वानप्रस्थी नई दिल्ली (प्रो. इच्छाराम द्विवेदी)