गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १० ) “गोरक्षशतकम्” सिद्धयोगी की वाणी है। इसके द्वारा योगमार्ग के अनेक अनसुलझे प्रश्नों का उत्तर श्री गोरखनाथजी ने दिया है। गोरक्षशतकम् एक सुस्पष्ट तथा निर्भ्रान्ति रचना है। इस रचना ने केवल भारतीय मनीषियों को अपनी ओर आकृष्ट किया है अपितु फर्गुहर तथा ब्रिग्स जैसे पाश्चात्य अन्वेषकों को भी चमत्कृत किया है। मथुरानाथ शुक्ल और शंकर पण्डित की टीकायें इस “गोरक्षशतकम्” पर प्रसिद्ध है। एक छोटी सी रचना में कैसे ज्ञान सिन्धु भरा जा सकता है इसका सुन्दर उदाहरण है यह गोरक्षशतकम्। अनुवादक ने भी बड़े ही सारगर्भित किन्तु सरल शब्दों में इसका राष्ट्रभाषानुवाद किया है जिससे कि यह और भी बोधगम्य हो गया है। सिद्धासन और पद्मासन की व्याख्या करते हुये श्री गोरखनाथजी ने कहा है- आसनेभ्यः समस्तेभ्यः द्वयमेव विशिष्यते । एकम् सिद्धासनम् प्रोक्तम् द्वितीयम् कमलासनम् ।। दोनों आसनों की संरचना पर उनका विवरण अद्वितीय है- योनिस्थानकमंघ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेत् । मेढ्रे पादमथैकमेव नियतं कृत्वा समं विग्रहम् ।। स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन् भ्रुवोरन्तरम्। एतन्मोक्षकवाटभेद जनकं सिद्धासनं प्रोच्यते ।। वामोरूपरि दक्षिणं हि चरणं संस्थाप्य वामं तथा। दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम् ।। अंगुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकयेत् । एतद् व्याधिविकारहारि यमिनां पद्मासनं प्रोच्यते ।। गोरखनाथजी ने अत्यन्त दक्षता से भारतीय योगविद्या का उपदेश किया है। श्रीमद् भागवत महापुराण में शुकदेवजी कहते है- प्राणायामैः दहेद् दोषान् धारणाभिश्च किल्बिषान् ।। गोरक्षशतकं का कथन तुलनीय है - आसनेन रुजां हन्ति प्राणायामेन पातकम्। विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण सर्वदा ।।