भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

( १३ ) है कि गोरक्षपद्धति और गोरक्षशतक गोरखनाथ द्वारा प्रतिपादित योग का प्रामाणिक ग्रन्थ है। गोरक्षशतक की जो पाण्डुलिपियाँ विभिन्न ग्रन्थागारों में उपलब्ध हैं वे सभी छपी भी नहीं है। मुझे दो छपी प्रतियाँ देखने को मिली हैं। एक स्वामी कुवलयानन्द जी द्वारा सम्पादित लोनावाला से छपी है और दूसरी श्री रामलाल श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित गोरखमन्दिर गोरखपुर से छपी है। स्वामी कुवलयानन्द जी योग के अन्वेषक प्रकृति के व्यक्ति थे, जिन्होंने योग से सम्बन्धित कई पुस्तकें प्रकाशित की और हठयोग के मूलग्रन्थ भी प्रकाशित किए। उनके द्वारा स्थापित संस्था लोनावाला में आज भी काम कर रही है। स्वामी कुवलयानन्द जी का गोरक्षशतक का संस्करण समीक्षात्मक है जिसमें पाठ-भेदों का उल्लेख किया गया है। पाठ भेदों का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है। पुरानी पुस्तकों में पाठ- भेद हो जाना अस्वाभाविक नहीं है, किन्तु ये पाठ-भेद अर्थ-भेद उत्पन्न नहीं करते। श्री रामलाल श्रीवास्तव गोरखनाथ के साहित्य के अधीत व्यक्ति है और गोरखनाथ पर उनकी पुस्तक भी है। वे गोरखनाथ मन्दिर से प्रकाशित होनेवाली योगवाणी पत्रिका के सम्पादक भी है। उनका गोरक्ष शतक का संस्करण समीक्षात्मक तो नहीं है किन्तु किसी एक पाण्डुलिपि का हू-ब-हू रूप है और शुद्ध भी है। संभव है, गोरखनाथ मन्दिर की परम्परा में यह प्रति उपलब्ध रही हो। गोरखपीठाधीश्वर स्वामी अवेधनाथजी महाराज की दृष्टि में यह संस्करण प्रामाणिक है, क्योंकि उन्होंने अपनी भूमिका में इसी का आधार लिया है और इसके मूल से पर्याप्त उद्धरण दिए है। दोनों संस्करणों में श्लोकों की संख्या एक सौ एक है, किन्तु मुख्य भेद यह है कि पचास से अधिक श्लोक एक दूसरे से भिन्न हैं अर्थात् एक दूसरे में नहीं हैं। गोरखनाथ मन्दिर वाले संस्करण में अजपाजप का बहुत अच्छा प्रतिपादन है, किन्तु लोनावाला संस्करण में यह बिल्कुल नहीं है। लोनावाला संस्करण में पंचमहाभूत धारणा का सुन्दर प्रतिपादन है जो गोरखनाथ मन्दिर वाले संस्करणों में नहीं है। ऐसे ही कुछ और अन्तर है। वैसे दोनों संस्करणों में गोरखनाथ की योग पद्धति से असम्बन्ध कुछ नहीं हैं। सभी विषय सम्बन्ध है, किन्तु विषयगत और प्रतिपादनगत थोड़े अन्तर के कारण एक दूसरे में एक अभाव की प्रतीति अवश्य होती है।

२. नाड़ी-शोधन, प्राण-अपान संयोग एवं कुण्डलिनी-प्रबोधन

( १४ ) गोरक्षशतकम् का प्रस्तुत संस्करण जिसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है, वह लोनावाला-संस्करण के आधार पर है, इसका सम्बन्ध गोरखनाथ मन्दिर वाले संस्करण से नहीं हैं इसका हिन्दी अनुवाद किया है- डॉ. मोतीलाल खड्डर शास्त्री (मास्टरजी) ने, जो पीताम्बरापीठ, दतिया से जुड़े हैं यह अनुवाद मूल से यथासंभव सम्बद्ध है इसलिये मूल पाठ को समझने के लिये बहुत अच्छा और बहुत उपयोगी हैं यह टीका या व्याख्या नहीं है, इसमें बहुत विस्तार की आवश्यकता होती है। पहली अपेक्षा होती है मूल से परिचित होने की जिसके लिये मूल से सम्बद्ध अनुवाद अपेक्षित है और विस्तार का द्वार तो कई माध्यमों से खुला रहता है। गोरक्षशतकम् में योग और तंत्र के साधनों का सामञ्जस्य है। इसमें तंत्र के कतिपय योगपरक साधन समाहित हैं अजपाजप और कुण्डलिनी योग वस्तुतः तंत्र की ओर से आये साधन हैं तंत्र और योग में आरम्भ से सामीप्य है जहां भेद करना कठिन होता है जो साधना की पुष्टि की दृष्टि से उत्तम संकेत है। गोरखनाथ का योग जो हठ योग के रूप में भी विकसित हुआ, तंत्रयोग के आधार पर हुआ, यह असंदिग्ध है। गोरक्षशतक में योग के छः अंग माने गये हैं जो आसन से आरम्भ होकर समाधि तक हैं। इसका कारण संभवतः यह है कि विधि रूप में क्रियात्मकता यहीं से आरम्भ होती है। इसका यह अर्थ नहीं कि गोरखनाथ पंतजलि के यम- नियम से अपरिचित है या उसकी मान्यता नहीं देते। सिद्धसिद्धान्त पद्धति में उन्होंने कहा है - यम इति उपरामः सर्वेन्द्रियजयः नियम इति मनोवृत्तीनां नियमनम्- सभी इन्द्रियों का अपने विषयों से हट जाना यम है तथा मन की सभी वृत्तियों का नियमन होना यम है। यम-नियम की उनकी यह परिभाषा बहुत सारगर्भित है, उसके आचारात्मक रूप की अपेक्षा यह अधिक योगपरक है। इसका सीधा सम्बन्ध उसके तात्पर्य से है। इसी तरह उन्होंने वहीं पर आसन से लेकर समाधि तक को तात्पर्यार्थ रूप में परिभाषित किया है।

( १५ ) गोरखनाथ ने यह कहकर कि योग वेद-रूप कल्पतरु का फल है, इसका सेवन करें, इससे सभी भवताप (दुःख) दूर हो जाते हैं। योग की गरिमा इंगित की हैं। द्विजसेवित शाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम् । शमनं भवतापस्य योगं भजति सज्जनः ।। गो.श.३ गोरखनाथ योग में सिद्धि के निमित्त ज्ञातव्य तथ्यों को जानने के लिये जोर देते हैं। उसके योग में साधना के सारे उपादान शरीर में ही है। शरीर एक घर है जिसमें साधना के सारे उपादान (सामग्रियाँ) मौजूद है। जो उपादानों के साथ इस घर को नहीं जानता वह सिद्धि की आशा कैसे कर सकता है ? षट्चक्रं षोडशधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् । स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्धयन्ति योगिनः ।। गो.श.३ एकस्तम्भं नवद्वारं गृहं पञ्चाधि दैवतम् । स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्धयन्ति योगिनः ।। (गोर.शत., गोरख-मन्दिर संस्करण, श्लो. : १३-१४) योगी अपनी देह में स्थित षट्चक्र, सोलह आधार, त्रिलक्ष्य (तीन लक्ष्य), पंचव्योम (पाँच आकाश) को नहीं जानते हैं वे कैसे योगसिद्ध हो सकते है ? अपनी ही देह में शरीर रूपी घर को जो एक स्तम्भ, नौ द्वार, पाँच तत्त्व और उनके पाँच अधिदैवत से युक्त या निर्मित है, नहीं जानते हैं, वे योगी कैसे योगसिद्ध हो सकते हैं ? गोरखनाथ की दृष्टि में आभ्यन्तरिक देह-विज्ञान को जानना जरूरी है। यदि इसका ज्ञान तथा उन सभी अंगों की क्रियाओं का ज्ञान नहीं है तो योग की विभिन्न प्रकार की साधनाओं में से किसी एक में भी सफलता प्राप्त करने की आशा दुराशा नहीं है। इस गोरक्षशतक में योग के छः अंगों पर प्रकाश डालकर उनकी साधना का संकेत तो किया ही गया है, इसके अतिरिक्त कुण्डलिनी, षट्चक्र-साधन पंचभूत-धारणा और ध्यानस्थान का परिणाम सहित प्रतिपादन किया गया है। साथ ही, उपाधि और तत्त्व का भेद भी स्पष्ट किया गया है। इन विषयों को मूल पाठ में देखना चाहिए। यहाँ उन्हें स्पष्ट करने पर बहुत विस्तार हो जायेगा।

( १६ ) इस योग में अजपाजप का बहुत महत्व है जिसका निर्देश गोरखनाथ- मन्दिर वाले संस्करण में किया गया है। उस संस्करण में महामुद्रा, खेचरी मुद्रा, शक्तिचालिनी मुद्रा, महाबन्ध और उड्डियान बन्ध इनका फल सहित सुन्दर वर्णन है। शिव और शक्ति के प्रतीक-रूप बिन्दु और रज की शरीर में यौगिक अवस्थिति का भी योग-पद्धति से विश्लेषण किया गया है। कहा है- बिन्दु शिवो रज शक्तिश्चन्द्रो विन्दूरजो रविः । उभयो सङ्गमादेव प्राप्यते परम् पदम् ॥ वायुना शक्तिचारेण प्रेरित तु महारजः । याति विन्दोः सहैकत्वं भवेद् दिव्यवपुस्तदा ।। शुक्र चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्येण संयुतम् । तयोः समरसैकत्वं यो जानाति स योगविद् ॥ (गोर.शत., गोरखनाथ-मन्दिर सं., श्लो. : ७४-७६) • बिन्दु (वीर्य) शिव है और रज शक्ति है। बिन्दु चन्द्रमा है और रज सूर्य है। (चन्द्र-स्थान में पाण्डुर वर्ण का बिन्दु (शुक्र) रहता है और सूर्य स्थान (नाभि) में सिन्दूर वर्ण का रज रहता है) इन दोनों के संगम से (योगी को) परम पद की प्राप्ति होती है। • वायु के द्वारा शक्ति के चालन से जब महा रज ऊपर उठकर बिन्दु के साथ मिलकर एक हो जाता है, तब शरीर दिव्य हो जाता है। • शुक्र चन्द्रमा से संयुक्त है और रज सूर्य से संयुक्त है। जो इन दोनों का सामरस्य-ऐक्य जानता है, वह योगवित् है। साधना कुण्डलिनी की हो या चन्द्रमा-सूर्य से सम्बन्धित बिन्दु-रज की, शिव-शक्ति का सामरस्य ही लक्ष्य है। गोरख की योग पद्धति में तन्त्रयोग का अद्भुत सामञ्जस्य है। ऐसा हठयोग में भी है। गोरक्षशतक में गोरख की योग-पद्धति के सिद्धान्त और प्रक्रिया का दिग्दर्शन हो जाता है। जिससे उसके विस्तार का द्वार खुल जाता है। यह गोरख की परम्परा में मान्य पुस्तक है। इन कारणों से इसे पढ़ा जाना चाहिए। मास्टर जी द्वारा हिन्दी अनुवाद उपलब्ध करा देने से उसमें सुविधा होगी।

( १७ ) गोरख के योग का प्रयोजन है, अपने शरीर के भीतर के साधक (सहायक) उपादानों को जानना, दुःख से मुक्त होना, आनन्दमय रहना ब्रह्ममय होना और अन्ततः अद्वैत में प्रतिष्ठित होना। उन्होंने इस शतक के समापन में कहा है- भवभयवनेः वह्निर्मुक्तिसोपानमार्गतः। अद्वयत्वं व्रजेन्नित्यं योगवित्परमे पदे॥ (गोरख शतकः १०१) (यह योग) संसार भय के जंगल के लिये अग्नि है और मुक्ति के लिए सोपान-मार्ग है जिससे योगी अद्वयत्व (अद्वैत) में पहुँचकर परम पद में निवास करता है। डॉ. मारुतिनन्दन पाठक पूर्व अध्यक्ष एवं आचार्य संस्कृत विभाग मगध विश्वविद्यालय, बोधगया ◆◆◆

( १८ ) गोरक्षनाथप्रणीतः ॐ गोरक्षशतकम् ॐ श्रीपरमगुरवे गोरक्षनाथाय नमः। ॐ गोरक्षशतकं वक्ष्ये भवपाशविमुक्तये। आत्मबोधकरं पुंसां विवेकद्वारकुञ्चिकाम्॥ १॥ गोरक्षशतकम् कहता हूँ। यह शतक संसार के बन्धन से मुक्त करानेवाला है। यह आत्मा के बोध को उत्पन्न करानेवाला तथा मनुष्यों के विवेक के द्वार को खोलने के लिए एक कुंजिका (चाबी) है॥ १॥ एतद्विमुक्तिसोपानमेतत्कालस्य वंचनम्। यद्ध्यावृत्तं मनो मोहादासक्तं परमात्मनि॥ २॥ यह गोरक्षशतकम् मुक्ति प्राप्ति का सोपान (साधन) है। इससे काल (मृत्यु) का वंचन (उल्लंघन) होता है (मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है, शरीर योगाभ्यास द्वारा स्वस्थ्य एवं परिपक्व हो जाता है और उसमें क्षीणता नहीं आती)। (इस शतक में वर्णित अभ्यास के द्वारा) मन मोह से मुक्त होकर परमात्मा में लग जाता है॥ २॥ द्विजसेवितशाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम्। शमनं भवतापस्य योगं भजति संज्जनः॥ ३॥ वेद कल्पतरु है। वेदरूपी कल्पतरू की शाखाओं का पण्डित जन सेवन (अनुशीलन) करते हैं जिसका फल यह योग है। सत्पुरुष इसका सेवन (साधन) करते है जिससे संसार का ताप (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) शमित (शान्त) हो जाता है॥ ३॥ आसनं प्राणसंयामः प्रत्याहारोऽथ धारणा। ध्यानं समाधिरेतानि योगांगानि भवन्ति षट्॥ ४॥

गोरक्षशतकम् ( १९ ) आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-योग के ये छहः अंग है। (गोरखनाथ के सिद्धसिद्धान्त पद्धति में यम-नियम सहित आठ अंगों की चर्चा की है, किन्तु यहाँ सीधे प्रक्रियागत क्रियात्मक साधना से सम्बन्ध होने के कारण छः अंग माना है।)॥४॥ आसनानि तु तावन्ति यावत्यो जीवजातयः। एतेषामखिलान्भेदान्विजानाति महेश्वरः॥५॥ जितने प्रकार के जीव (प्राणी) हैं उतने ही प्रकार के आसन हैं। उनके सभी भेद शिव जानते है॥५॥ चतुराशीतिलक्षाणामेकमेकमुदाहृतम्। ततः शिवेन पीठानां षोडशोनं शतं कृतम्॥६॥ महेश्वर (शिव) ने चौरासी लाख आसनों में से प्रत्येक का वर्णन किया है। उनमें से चौरासी आसनों को उन्होंने मुख्य बताया है॥६॥ आसनेभ्यः समस्तेभ्यो द्वयमेव विशिष्टते। एकं सिद्धासनं प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम्॥७॥ उन सभी आसनों में केवल दो आसन प्रधान कहे गये है- एक सिद्धासन और दूसरा पद्मासन॥७॥ योनिस्थानकमंघ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसे न्मेढ्रे पादमथैकमेव नियतं कृत्वा समं विग्रहम्। स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन्भ्रुवोरंतर मे तन्मोक्षकवाटभेदजनकं सिद्धासनं प्रोच्यते॥८॥ गुदा और मेढ्र (लिंग) के मध्य में योनिस्थान है जिसे कुण्डलिनी-स्थान भी कहा जाता है। साधक इस योनिस्थान को (बांए) पाव की एडी से दबाकर (दाए) पांव की एड़ी को मेढ्र पर लगाए और शरीर को बिल्कुल सीधा रखे। सभी इंद्रियों को वश में रखते हुए भ्रू-मध्य में अचल दृष्टि से देखता रहे तथा स्वयं भी स्थिर एवं अचल रहे। यही मोक्ष के द्वार को खोलनेवाला सिद्धासन कहा गया है॥८॥ वामोरूपरि दक्षिणं हि चरणं संस्थाप्य वामं तथा दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम्।

( २० ) गोरक्षनाथप्रणीतः अंगुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासग्रमालोकये- देतद्व्याधिविकारहारि यमिनां पद्मासनं प्राच्यते ॥ ९ ॥ वाम जंघा (जंघा के मूल में) दाहिना पांव (चरण) स्थापित करे तथा उसी प्रकार दाहिनी जंघा पर वायां पांव स्थापित करें और दोनों हाथों को पीछे से ले जाकर दाहिने हाथ से बाएं पांव के अंगूठे और बाएं हाथ से दाहिने पांव के अंगूठे को दृढ़ता से पकड़कर एवं चिबुक को हृदय से लगाकर नासिका के अग्रभाग को (दोनों नेत्रों से) देखें। इसे समस्त व्याधियों और (शारीरिक एवं ानसिक) विकारों को नष्ट करनेवाला पद्मासन कहा गया है ॥ ९ ॥ आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् । योनिस्थानम् द्वयोर्मध्ये कामरूपम् निगद्यते ॥ १० ॥ आधार (मूलाधार) चक्र पहला है, दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान है। दोनों के मध्य में स्थित योनिस्थान को कामरूप कहा जाता है ॥ १० ॥ आधाराख्ये गुदस्थाने पंकजं यच्चतुर्दलम् । तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवंदिता ॥ ११ ॥ मूलाधार चक्र जो गुदास्थान में है और जो चार (कमल) दलों से युक्त है. उसके मध्य में (त्रिकोणाकार) योनि है। यह (योनि) सिद्धों द्वारा कामाक्षा (कामाक्षा पीठ) कहा गया है ॥ ११ ॥ योनिमध्ये महालिंगं पश्चिमाभिमुखं स्थितम् । मस्तके मणिवद्भिन्नम् यो जानाति स योगवित् ॥ १२ ॥ उस (कामाक्षा) योनि के मध्य में पश्चिमाभिमुख महालिंग स्थित है। उस महालिंग के मस्तक में मणि के सदृश (प्रदीप्त) बिम्ब को जो जानता है वही योगवेत्ता है ॥ १२ ॥ तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् । चतुरस्रं पुरं वन्हेरोधोमेढ्रात्प्रतिष्ठितम् ॥ १३ ॥ मेढ्र से नीचे (मूलाधार पद्म की कर्णिका में) तपे हुये सोने के वर्ण की आभा और विद्युल्लेखा के सदृश ज्योतिर्मय चतुरस्त्राकार अग्निमय (वह योनिस्थान) है। (पाठान्तर त्रिकोणाकार भी है) ॥ १३ ॥

गोरक्षशतकम् ( २१ ) स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयः । स्वाधिष्ठानाख्यया तस्मान्मेढ़वाभिधीयते ।। १४ ।। 'स्व' शब्द प्राण का उद्गम है । (स्व शब्द से प्राण का बोध होता है।) स्वाधिष्ठान ही प्राण का आश्रम या स्थान है । अतः स्वाधिष्ठान पद ही मेढ़ कहा जाता है ।। १४ ।। तंतुना मणिवत्प्रोतो यत्र कंदः सुषुम्णया । तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् ।। १५ ।। सूत्र में पिरोए मणि के समान सुषुम्ना नाड़ी का केन्द्र है। यह नाभिमण्डल में स्थित (कन्द) मणिपूरक चक्र कहा जाता है ।। १५ ।। ऊर्ध्व मेढ्रादधो नाभेः कन्दयोनिः खगांडवत् । तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणि द्विसप्ततिः ।। १६ ।। मेढ्र से ऊपर और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे के सदृश्य कन्द-योनि है । यहां से (इस कन्दयोनि से) बहत्तर हजार नाड़ियां उत्पन्न होती है ।। १६ ।। तेषु नाडिसहस्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृताः । प्राधान्यात्प्राणवाहिन्यो भूयस्तत्र दश स्मृताः ।। १७ ।। इन सहस्रों नाड़ियों में बहत्तर हजार नाड़ियां मुख्य है और उन (बहत्तर हजार नाड़ियों) में भी दस प्राणवाहिनी नाड़ियां ही प्रधान है ।। १७ ।। इडा च पिंगला चैव सुषुम्णा च तृतीयाका । गांधारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी ।। १८ ।। अलंबुषा कुहूश्चैव शंखिनी दशमी स्मृता । एतन्नाडिमयं चक्रं ज्ञातव्यं योगिभिः सदा ।। १९ ।। (पहली) इडा, (दूसरी) पिंगला और तीसरी सुषुम्ना नाड़ी है । (इनके अतिरिक्त) गांधारी, हस्तिजिह्वा, पूषां, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू और शंखिनी ये दस नाड़ियां (प्रधान) है । योगियों को इन नाड़ियों से युक्त चक्र को सदा जानना चाहिये ।। १८-१९ ।। इडा वामे स्थिता भागे पिंगला दक्षिणे तथा । सुषुम्णा मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुषि ।। २० ।।

( २२ ) गोरक्षनाथप्रणीतः दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णे च दक्षिणे। यशस्विनी वामकर्णे चानने वाप्यलंबुषा ॥ २१ ॥ कूहूश्च लिंगदेशे तु मूलस्थाने च शंखिनी। एवं द्वारमुपाश्रित्य तिष्ठन्ति दश नाडिकाः ॥ २२ ॥ सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः। इडापिंगलासुषुम्णा च तिस्रो नाड्य उदाहृताः ॥ २३ ॥ (नासिका के) वाम भाग में इडा और दक्षिण भाग में पिंगला नाड़ी है (इन दोनों के) मध्य में सुषम्ना है। गांधारी वाम नेत्र में और दक्षिण (दाहिने) नेत्र में हस्तिजिह्वा है। पूषा दाहिने कान में और यशस्विनी बाएं कान में है। मुख में अलम्बुषा है और लिंगदेश में कुहू हैं। शंखिनी मूलस्थान (मूलाधार) में है। इस प्रकार ये दस नाड़ियां (प्राणवायु के) द्वार में स्थित है। इडा, पिंगला और सुषम्ना प्राण के मार्ग में स्थित है और निरन्तर (शरीर में) प्राण का संचार करती रहती है। इनके देवता (इडा के) चन्द्रमा, (पिंगला के) सूर्य और (सुषुम्ना के) अग्नि है॥ २०-२३॥ प्राणापानौ समानश्च ह्युदानो व्यान एव च। नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनंजयः ॥ २४ ॥ नागाद्याः पंच विख्याताः प्राणाद्याः पंच वायवः। एते नाडिसहस्रेषु वर्तन्ते जीवरूपिणः ॥ २५ ॥ प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान (ये पांच) तथा नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनंजय (ये पांच) ऐसे कुल दस वायु है जो हजारों नाड़ियों में जीव रूप में रहते है॥ २४-२५॥ प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं च धावती। वामदक्षिणमार्गेण चंचलत्वान्न दृश्यते ॥ २६ ॥ जीव, प्राण और अपान के वश में होकर वाम और दक्षिण मार्ग से (इडा और पिंगला के द्वारा) नीचे से ऊपर एवं ऊपर से नीचे की ओर दौड़ता (चढ़ता- उतरता) रहता है जो चंचलता के कारण दिखाई नहीं पड़ता है॥ २६॥

गोरक्षशतकम् ( २३ ) आक्षिप्तो भुवि दण्डेन यथोच्चलति कंदुकः । प्राणापानसमाक्षिप्तस्तथा जीवोऽनुकृष्यते ॥ २७ ॥ रज्जुबद्धो यथा श्येनो गतोऽप्याकृष्यते पुनः । गुणबद्धस्तथा जीवः प्राणापानेन कृष्यते ॥ २८ ॥ अपानः कर्षति प्राणं प्राणोऽपान च कर्षति । ऊर्ध्वाधः संस्थितावेतौ यो जानाति स योगवित् ॥ २९ ॥ जिस प्रकार दण्ड के द्वारा आक्षिप्त (उछालने या ताड़ित) होने से गेंद पृथ्वी पर उछलती रहती है उसी प्रकार प्राण और अपान के द्वारा आक्षिप्त (आकृष्ट) होकर जीव (जीवात्मा) (क्षण भर भी) स्थिर नहीं रह पाता। जिस प्रकार डोरी से बंधा बाज पक्षी (डोरी ढील देने पर) ऊपर उड़ने लगता है। डोरी खिंचने पर नीचे आ जाता है उसी प्रकार (सत्व, रज, तम) गुणों (वासना और अविद्या) में बंधा हुआ जीव प्राण और अपान के द्वारा ऊपर नीचे खिंचता रहता है। अपान प्राण को खिंचता है और प्राण अपान को खिंचता है इस तरह ऊपर-नीचे खिंचते प्राण-अपान को जो संयोजित करना जानता है वहीं योगवेत्ता है ।। २७-२९ ।। कंदोर्ध्वं कुंडलीशक्तिरष्टधा कुंडलीकृता । ब्रह्मद्वारमुखं नित्यं मुखेनावृत्य तिष्ठति ।। ३० ।। कन्द (मेढ्र के ऊपर और नाभि के नीचे जो कन्द है, वह सभी नाड़ियों का उत्पत्ति-स्थान है ।) के ऊपर कुण्डलिनी शक्ति आठ प्रकार की होकर कुण्डलित रूप में ब्रह्मरन्ध्र को अपने मुख से आच्छादित करके (रोककर) स्थित है ।। ३० ।। प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मारुता हतां । प्रजीवगुणमादाय व्रजत्यूर्ध्वं सुषुम्णया ।। ३१ ।। वह (कुण्डलिनी) वह्नियोग से जागृत होकर मन और प्राण (वायु) के द्वारा आहत होकर अथवा उनके साथ डोर में बंधी सुई के समान सुषुम्ना-पथ में ऊपर उठती है ।। ३१ ।।

. ( २४ ) गोरक्षनाथप्रणीतः महामुद्रां नभोमुद्रामुड्डियानं जलंधरम्। मूलबंधं च यो वेत्तिः स योगी सिद्धिभाजनम् ।। ३२ ।। जो योगी महामुद्रा, नभोमुद्रा (खेचरी मुद्रा), उड्डियान बंध, जालन्धर बन्ध और मूलबंध जानता (अभ्यास में निष्णात) है वही योगी सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त करने का अधिकारी होता है ।। ३२ ।। वक्षोन्यस्तहनुर्निपीड्य सुचिरं योनिं च वामांघ्रिणा हस्ताभ्यामवधारितं प्रसरितं पादं तथा दक्षिणम् । आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बंद्ध्वा शनैः रेच येदेषा । पातकनाशिनी सुमहती मुद्रा नृणां प्रोच्यते ।। ३३ ।। वक्ष (हृदय) में ठोढी को लगाकर साधक बाएं पांव (की एड़ी) से योनिस्थान को देर तक दबाकर रखे तथा दोनों हाथों से फैले हुए दाहिने पांव को पकड़े और दोनों कुक्षियों को पूरक द्वारा वायु से भरे, फिर (कुम्भक द्वारा रोककर और रेचक द्वारा) धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। यह मनुष्यों की सभी पातकनाशिनी (व्याधिविनाशिनी) महामुद्रा कही जाती है ।। ३३ ।। कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा । भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टर्मुद्रा भवति खेचरी ।। ३४ ।। जिह्वा (जीभ का अग्रभाग) को उलटा लौटाकर कपाल-कुहर में प्रविष्ट कराया जाता है और दृष्टि दोनों भौहों के बीच में स्थिर की जाती है। यही खेचरी मुद्रा है ।। ३४ ।। ऊर्ध्व मेढ्रादधो नाभेरुड्डियानं प्रचक्षते । उड्डियानजयो बंधो मृत्युमातंगकेसरी ।। ३५ ।। मेढ़्र से ऊपर और नाभि से नीचे भाग को उड्डियान बन्ध कहा जाता है। (उड्डियान बन्ध में इस भाग को पीछे (अन्दर) की ओर खिंचना होता है।) उड्डियान बन्ध सिद्ध होने पर यह मृत्युरूपी हाथी के लिये सिंह के समान है ।। ३५ ।। जालंघरे कृते बंधे कंठसंकोचलक्षणे । न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रकुप्यति ।। ३६ ।।

गोरक्षशतकम् ( २५ ) जालन्धर बन्ध में कण्ठ का संकोचन करना होता है। (संकुचित कण्ठ में ठुड्डी को लगा दिया जाता है) जालन्धर बन्ध से (बिन्दु-स्थित चन्द्रमा से निस्पन्दित होने वाला) अमृत (मणिपुर में स्थित) अग्नि में नहीं गिरता (गिरकर भस्म नहीं होता) और वायु भी प्रकुपित नहीं होती ॥ ३६ ॥ पार्ष्णिभागेन संपीड्य योनिमाकुंचयेद्गुदम् । अपानमूर्ध्वमाकृष्य मूलबंधो निगद्यते ॥ ३७ ॥ पांव की एड़ी से योनिस्थान को ठीक से दबाकर गुदा को सिकोड़ना चाहिये और अपान वायु को ऊपर की ओर खिंचना चाहिये (तथा प्राणवायु से मिलाना चाहिये। यही मूलबन्ध है) इसे मूलबन्ध कहा जाता है ॥ ३७ ॥ यतः कालभयात् ब्रह्मा प्राणायामपरायणः । योगिनो सुनयश्चैव ततः प्राणं निबंधयेत् ॥ ३८ ॥ काल (मृत्यु) के भय से ब्रह्मयोगी और मुनिगण प्राणायाम का अभ्यास करते रहते है। इसलिये (सभी को) प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये ॥ ३८॥ चले वाते चलं सर्वं निश्चले निश्चलं भवेत् । योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निबंधयेत् ॥ ३९ ॥ जब तक (शरीर में) वायु (प्राण) चंचल है तब तक सब कुछ चंचल रहता है, उसके निश्चल (स्थिर) होने पर अन्य सभी स्थिर हो जाते है। इससे योगी स्थाणुत्व (निश्चलता, स्थिरता) प्राप्त करता है, इसलिये प्राणायाम करना चाहिये ॥ ३९ ॥ षट्त्रिंशदंगुलं हंसः प्रयाणं कुरुते बहिः । वामदक्षिणमार्गेण ततः प्राणोऽभिधीयते ॥ ४० ॥ (प्राण-रूप वायु) हंस वाम और दक्षिण नासा-रन्ध्रों से छत्तीस अंगुल (की दूरी तक) बाहर निकलता है, इसलिये (वायु को) प्राण कहा जाता है ॥ ४० ॥ बद्धपद्मासनो योगी नमस्कृत्य गुरुं शिवम् । नासाग्रदृष्टिरेकाकी प्राणायामं समभ्यसेत् ॥ ४१ ॥ बद्धपद्मासन में बैठकर शिव-रूप गुरु को नमस्कार कर नासिका के

३. बन्ध, मुद्रा, समाधि-लक्षण एवं शतक उपसंहार

( २६ ) गोरक्षनाथप्रणीतः अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुये एकाकी (एकान्त में अकेला) योगी को प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये ॥ ४१ ॥ प्राणो देहस्थितो वायुरायामस्तन्निबन्धनम्। एकश्वासमयी मात्रा तद्योगो गगनायते ॥ ४२ ॥ शरीर में स्थित प्राणवायु तथा अपान वायु का निरोध पूर्वक मिलना और एक श्वास हो जाना- यह योग ऊर्ध्वगामी एवं उत्कृष्ट है। (प्राण और अपान का मिलना एक श्रेष्ठ योग है ॥ ४२ ॥ बद्धपद्मासनो योगी प्राणं चंद्रेण पूरयेत्। धारयित्वा यथाशक्ति भूयः सूर्येण रेचयेत् ॥ ४३ ॥ योगी को बद्धपद्मासन में बैठकर चन्द्रनाड़ी (वाम नासिकारन्ध्र) से प्राणवायु को भीतर खिंचकर कुम्भक करना चाहिये और उसके बाद सूर्य नाड़ी (दक्षिण नासिकारन्ध्र) से उसे बाहर निकालना (रेचक करना) चाहिये ॥ ४३ ॥ अमृतोदधिसंकाशं क्षीरोदधवलप्रभम्। ध्यात्वा चंद्रमयं बिम्बं प्राणायामे सुखी भवेत् ॥ ४४ ॥ अमृत के समुद्र की आभा सदृश और दुग्ध-समुद्र की धवल प्रभा-सदृश चन्द्र-बिम्ब का ध्यान कर प्राणायाम करने से साधक सुखी होता है ॥ ४४ ॥ प्राणं सूर्येण चाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः। कुंभयित्वा विधानेन भूयश्चन्द्रेण रेचयेत् ॥ ४५ ॥ सूर्यनाड़ी (दक्षिण नासिका-छिद्र) से प्राणवायु धीरे-धीरे खींचकर उदर को भरना चाहिये, फिर विधिपूर्वक कुम्भक करना चाहिये। पुनः चन्द्रनाड़ी (वाम नासिका-छिद्र) से (धीरे-धीरे रेचक करना चाहिये) ॥ ४५ ॥ प्रज्ज्वलज्ज्वलन ज्वाला पुञ्जमादित्यमण्डलम्। ध्यात्वा नाभिस्थितं योगी प्राणायामे सुखी भवेत् ॥ ४६ ॥ नाभि में स्थित अत्यन्त प्रज्ज्वलित अग्नि की ज्वाला के पुञ्ज से युक्त सूर्यमण्डल का ध्यान कर प्राणायाम करने से योगी सुखी होता है ॥ ४६ ॥ रेचकः पूरकश्चैव कुम्भकः प्रणवात्मकः। प्राणायामो भवेत्त्रेधा मात्राद्वादशसंयुतः ॥ ४७ ॥

गोरक्षशतकम् ( २७ ) प्रणव के साथ रेचक, पूरक और कुम्भक तीन प्रकार से प्राणायाम होता है। इसमें बारह मात्रा का अनुपात होना चाहिये ॥ ४७ ॥ द्वादशाधमके मात्रा मध्यमे द्विगुणास्ततः । उत्तमे त्रिगुणा मात्राः प्राणायामस्य निर्णयः ॥ ४८ ॥ बारह मात्रा के अनुपातवाला प्राणायाम अधम (निम्न) होता है, इसके द्विगुण (चौबीस मात्रा के अनुपातवाला) मध्यम और उसके त्रिगुण (छत्तीस मात्रा के अनुपातवाला) उत्तम होता है ॥ ४८ ॥ अधमे च घनो घर्मः कम्पो भवति मध्यमे । उत्तमे त्रिगुणा मात्राः प्राणायामस्य निर्णयः ॥ ४९ ॥ अधम प्राणायाम में अतिशय स्वेद (पसीना) होता है, मध्यम में शरीर में कम्पन होता है और उत्तम में बद्धपद्मासन में ही (कुछ ऊपर) उठ जाता है ॥४९॥ अंगानां मर्दनं शस्तं श्रमसंजातवारिणा । कट्वम्ललवणत्यागी क्षीरभोजनमाचरेत् ॥ ५० ॥ प्राणायाम के श्रम से उत्पन्न स्वेद (पसीने) को (शरीर के) अंगों में मलना प्रशस्त (लाभदायक) है। (प्राणायाम-साधना काल में) कटु, अम्ल तथा लवण पदार्थ का त्याग करना चाहिये और दुग्ध पदार्थ का भोजन करना चाहिये ॥५०॥ मन्दम् मन्दम् पिबेद्वायु मन्दम् मन्दम् वियोजयेत् । नाधिकं स्तम्भयेद्वायुं न च शीघ्रं विमोचयेत् ॥ ५१ ॥ धीरे-धीरे वायु-पान करना चाहिये और धीरे-धीरे ही उसे ग्रहण करना चाहिये। अधिक (ज्यादा देर तक) स्तम्भन (कुम्भक) नहीं करना चाहिये तथा शीघ्रता से रेचन भी नहीं करना चाहिये ॥ ५१ ॥ ऊर्ध्वमाकृष्य चापानं वात प्राणे नियोजयेत् । मूर्धानं नीयते शक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५२ ॥ अपान वायु को ऊपर खींचकर प्राण में नियोजित करना चाहिये। (इसकी) शक्ति से (चेतना की) ऊर्ध्वगामिता होती है और सभी पापों से मुक्ति मिलती है ॥ ५२ ॥

( २८ ) गोरक्षनाथप्रणीतः प्राणायामो भवत्येवं पातकेन्धनपावकः। एनोम्बुधिमहासेतुः प्रोच्यते योगिभिः सदा ॥ ५३ ॥ इस प्रकार प्राणायाम पातकरूपी ईंधन के लिये अग्नि है यह पापों को जला डालता है। यह पापों के समुद्र के लिये महासेतु है। योगीजन सदा ऐसा कहते हैं ॥ ५३ ॥ आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम् । विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण सर्वदा ॥ ५४ ॥ योगी आसन से रोग नष्ट करता है, प्राणायाम से पातक नष्ट करता है और प्रत्याहार से मानसिक विकार नष्ट करता है ॥ ५४ ॥ चन्द्रामृतमयी धारां प्रत्याहरति भास्करः । तत्प्रत्याहरणं तस्य प्रत्याहारः स उच्यते ॥ ५५ ॥ चन्द्रमा की अमृतधारा को सूर्य रोक देता है अर्थात् सुखा देता है या नष्ट कर देता है। जो इस अवरोध को रोक दे उसे प्रत्याहार कहा जाता है ॥ ५५ ॥ एका स्त्री भुज्यते द्वाभ्यामागता सोममंडलात् । तृतीयो यो भवेत्ताभ्यां स भवत्यजरामरः ॥ ५६ ॥ सोममण्डल से आयी हुई एक स्त्री (चन्द्रामृतमयी धारा) दो के द्वारा युक्त होती है। उन दोनों से भिन्न तीसरे के होने से वह (योगी) अजर-अमर हो जाता है। (यह इस योग की एक प्रक्रिया है जो सुधा और नाड़ियों से सम्बन्धित है जिसे साधकों को उस सम्प्रदाय के योगियों से जानना चाहिये) ॥ ५६ ॥ नाभिदेशे भवत्येको भास्करो दहनात्मकः । अमृतात्मा स्थितो नित्यं तालुमूले च चन्द्रमाः ॥ ५७ ॥ नाभि-स्थान में दहन (जलाकर भस्मसात) करनेवाला सूर्य स्थित है और तालुमूल (तालु मध्य) में अमृतात्मा (अमृत निस्पन्दित करते हुये) चन्द्रमा स्थित है ॥ ५७ ॥ वर्षत्यधोमुखश्चन्द्रो ग्रसत्यूर्ध्वमुखो रविः । ज्ञातव्यं करणं तत्र येन पीयूषमाप्यते ॥ ५८ ॥

गोरक्षशतकम् ( २९ ) (तालुमूल में) अधोमुख चन्द्रमा अमृत बरसाता है और (नाभि देश में) ऊर्ध्वमुख सूर्य उसे ग्रस (सोख) लेता है। योगी को वह (विधि) जाननी चाहिये जिससे अमृत प्राप्त हो ॥ ५८ ॥ ऊर्ध्वनाभिरधस्तालु ऊर्ध्वभानुरधः शशी । करणं विपरीताख्यं गुरुवक्त्रेण लभ्यते ॥ ५९ ॥ नाभि ऊर्ध्व (ऊपर) और तालु अधः (नीचे) तथा सूर्य ऊपर और चन्द्रमा नीचे हो जाये, यह विपरीत करने की क्रिया (किसी योगी) गुरु के मुख से जाननी चाहिये ॥ ५९ ॥ त्रिधा बद्धो वृषो यत्र रौरवीति महारवनम् । अनाहतं च तच्चक्रं हृदये योगिनो विदुः ॥ ६० ॥ वृषभ (सांड़े) तीन तरफ से बंधा हुआ है और घोर गर्जना कर रहा है। हृदय में यह अनाहत चक्र है जिसे योगी लोग जानते है ॥ ६० ॥ अनाहतमतिक्रम्य चाक्रम्य मणिपूरकम् । प्राप्ते प्राणे महापद्मं योगित्वममृतायते ॥ ६१ ॥ मणिपूर और अनाहत के अतिक्रमण होने पर प्राण की अवस्थिति महापद्म में होती है। (अनाहत में पहुचने पर ही) योगित्व (योगी कहलाने लायक) की संज्ञा होती है जो अमृतमय है ॥ ६१ ॥ विशब्दः संस्मृतो हंसो निर्मलः शुद्ध उच्यते । अतः कण्ठे विशुद्धाख्यं चक्रं चक्रविदो विदुः ॥ ६२ ॥ विशब्द (निरशब्दता) हंस का द्योतक और निर्मलता को शुद्धि कहा जाता है। इसलिये कण्ठ में विशुद्धि चक्र है। (इसे शुद्धि का चक्र भी कहा जाता है जहां सब कुछ शुद्ध और संतुलित हो जाता है) इसे (इस तथ्य को) चक्रों के ज्ञाता जानते है ॥ ६२ ॥ विशुद्धे परमे चक्रे धृत्वा सोमकलाजलम् । मासेन न क्षयं याति वंचयित्वा मुखं रवेः ॥ ६३ ॥ (विशुद्धि चक्र के जागृत होने पर) परम विशुद्धि चक्र में चन्द्रमा की कलाओं का जल (अमृत) धारण करने पर महीने भर उसका क्षय नहीं होता

( ३० ) गोरक्षनाथप्रणीतः और वह (अमृत) सूर्य के मुख में जाने से बच जाता है ।। ६३ ।। संपीड्य रसनाग्रेण राजदंतबिलं महत् । ध्यात्वाऽमृतमयीं देवीं षण्मासेन कविर्भवेत् ।। ६४ ।। जिह्वा के अग्रभाग से राजदन्त के छिद्र को दबाकर और उस अमृतमयी देवी का ध्यान कर (जो योगी उस अमृत को धारण करता है वह) छः महीने में कवि हो जाता है ।। ६४ ।। अमृतापूर्णदेहस्य योगिनो द्वित्रिवत्सरात् । ऊर्ध्वं प्रवर्तते रेतोप्यणिमादिगुणोदयः ।। ६५ ।। योगी दो-तीन वर्षों तक देह को अमृतपूर्ण बनाये रखे तो उसका रेतस् ऊर्ध्वगामी हो जाता है और उस देह में अणिमादि सिद्धियों का उदय होने लगता है ।। ६५ ।। इन्धनानि यथा वह्निस्तैलैर्वर्त्तिं च दीपकः । तथा सोमकलापूर्णं देही देहं न मुंचति ।। ६६ ।। जिस प्रकार ईंधन होने पर अग्नि जलती रहती है, तेल से पूर्णवर्तिका होने पर दीपक जलता रहता है। उसी प्रकार सोमकला (अमृत) पूर्ण देह को देही (आत्मा) त्याग नहीं करती। (उस अमृतपूर्ण देह में वह बनी रहती है) ।। ६६ ।। आसनेन समायुक्तः प्राणायामेन संयुतः । प्रत्याहारेण संयुक्तो धारणाश्च समभ्यसेत् ।। ६७ ।। आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार से संयुक्त (इन तीनों के पूर्ण अभ्यास सिद्ध) होने पर धारणा का अभ्यास करना चाहिये ।। ६७ ।। हृदये पंचभूतानां धारणाश्च पृथक् पृथक् । मनसो निश्चलत्वेन धारणा च विधीयते ।। ६८ ।। हृदय में पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) की धारणा पृथक्-पृथक् करनी चाहिये । मन की निश्चलता से धारणा होती है। (एकाग्रता को ही धारणा कहा जाता है।) ।। ६८ ।।

गोरक्षशतकम् ( ३१ ) या पृथ्वी हरितालदेशरुचिरा पीता लकरान्विता संयुक्ता कमलासनेन हि चतुष्कोणा हृदि स्थायिनी । प्राणं तत्र विनीय पंचघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा स्तम्भकरी सदा क्षितिजयं कुर्याद्भुवो धारणा ।। ६९ ।। जिसे पृथ्वी (तत्त्व या महाभूत) कहते है वह (मूलाधार) में कमलासन (चार दलों वाले कमल) पर हरिताल की तरह पीली आभा से युक्त पीले रंग के चतुष्कोण के मध्य पीताभलंकार (लं बीज से युक्त) है वहां पांच घटिका तक प्राण और चित्त को स्थिर करके उसकी धारणा करनी चाहिये। यह स्तम्भकारी है और इसके द्वारा पृथ्वी (तत्त्व या भूत) पर जय प्राप्त करनी चाहिये। यही पृथ्वी धारणा है ।। ६९ ।। अर्धेन्दुप्रतिमं च कुंदधवलं कंठेबुतत्त्वं स्थितं यत्पीयूषवकार बीज सहितं युक्तं सदा विष्णुना। प्राणं तत्र विनीय पंचघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा दुर्वहकालकूटजरणा स्याद्वारिणी धारणा ।। ७० ।। (स्वाधिष्ठान चक्र में) जहां अर्ध चन्द्रमा है उसके कण्ठ (ऊपरी भाग में) कुन्द-पुष्प के समान धवल जल तत्त्व स्थित है और वहां विष्णु के साथ अमृत-स्वरूप वकार बीज है। वहां पर पांच घटिका तक प्राण और चित्त को स्थित कर धारणा करनी चाहिये। यह दुर्वह (महाकठिन) कालकूट (हलाहल विष) को भी क्षीण करनेवाला है। यह वारिणी (जल महाभूत की) धारणा है।। ७० ।। यत्तालस्थितमिंद्रगोपसदृशं तत्त्वं त्रिकोणोज्ज्वलं तेजोरेफमयं प्रवालरुचिरं रुद्रेण यत्संगतम् । प्राणं तत्र विनीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा वह्निजयं सदा विदधते वैश्वानरी धारणा ।। ७१ ।। (मणिपुर चक्र में) जल से भरे बादलों के रंग वाले कमलों के मध्य रक्तिम त्रिकोण में रक्त वर्ण का रकार (रं बीज) है जिस पर रक्त वर्णी रुद्र हैं वहां पर पांच घटिका तक प्राण और चित्त स्थिर कर धारणा करने से अग्नि-जय होती है। यह वैश्वानरी (अग्नि-भूत की) धारणा है ।। ७१ ।।

. ( ३२ ) गोरक्षनाथप्रणीतः यद्भिन्नांजनपुंजसान्निभमिदं तत्त्वं भ्रुवोरन्तरे वृत्तं वायुमयं यकारसहितं यत्रेश्वरो देवता। प्राणं तत्र विनीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा खे गमनं करोति यमिनां स्याद्वायवी धारणा ।। ७२ ।। (अनाहत चक्र में) जहां भिन्नाञ्जनपुंजसान्निभ (धूम वर्ण का) वायु तत्त्व का यकार (यं बीज) है। और उसके देवता ईश्वर है, वहां पांच घटिका, तक प्राण और चित्त को स्थिर कर धारणा करनी चाहिये जिससे योगी आकाश गमन में समर्थ होता है। यह वायवी (वायु भूत की) धारणा है ।। ७२ ।। आकाशं सुविशुद्धवारिसदृशं यद्ब्रह्मरन्ध्रे स्थितं, तत्राद्येन सदाशिवेन सहितं शांतं हकाराक्षरम्। प्राणं तत्र विनीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वयं धारये- देषा मोक्षकवाटपाटनपटुः प्रोक्ता नभोधारणा ।। ७३ ।। (विशुद्धि चक्र में) जहां विशुद्ध जल के सदृश (उज्ज्वल) आकाश-तत्त्व स्वरूप, हकार (हं बीज) शान्त सदाशिव के साथ स्थित है, वहां पांच घटिका तक प्राण और चित्त को स्थिर कर धारणा करनी चाहिये। यह धारणा मोक्ष के कपाट को खोलने वाली है। इसे नभोधारणा (आकाश-भूत की धारणा) कहते है ।। ७३ ।। स्तम्भनी द्रावणी चैव दहनी भ्रामणी तथा। शोषणी च भवन्त्येव भूतानां पंचधारणाः ।। ७४ ।। स्तम्भनी, द्राविणी, दहनी, भ्रामणी और शोषणी ये (पंच) भूतों की पांच धारणाएं है ।। ७४ ।। कर्मणा मनसा वाचा धारणाः पंच दुर्लभाः। विधाय सततं योगी सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। ७५ ।। कर्म, मन और वाणी से (अभ्यास करने योग्य) ये पांच धारणाएं दुर्लभ है। इनका सतत् अभ्यास करने से योगी सभी पापों से मुक्त हो जाता है ।।७५ ।। सर्व चिंतासमावर्ति योगिनो हृदि वर्तते । यत्तत्वे निश्चितं चेतस्तत्तु ध्यानं प्रचक्षते ।। ७६ ।।