भारतकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

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गोरक्षशतकम् ( १९ ) आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-योग के ये छहः अंग है। (गोरखनाथ के सिद्धसिद्धान्त पद्धति में यम-नियम सहित आठ अंगों की चर्चा की है, किन्तु यहाँ सीधे प्रक्रियागत क्रियात्मक साधना से सम्बन्ध होने के कारण छः अंग माना है।)॥४॥ आसनानि तु तावन्ति यावत्यो जीवजातयः। एतेषामखिलान्भेदान्विजानाति महेश्वरः॥५॥ जितने प्रकार के जीव (प्राणी) हैं उतने ही प्रकार के आसन हैं। उनके सभी भेद शिव जानते है॥५॥ चतुराशीतिलक्षाणामेकमेकमुदाहृतम्। ततः शिवेन पीठानां षोडशोनं शतं कृतम्॥६॥ महेश्वर (शिव) ने चौरासी लाख आसनों में से प्रत्येक का वर्णन किया है। उनमें से चौरासी आसनों को उन्होंने मुख्य बताया है॥६॥ आसनेभ्यः समस्तेभ्यो द्वयमेव विशिष्टते। एकं सिद्धासनं प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम्॥७॥ उन सभी आसनों में केवल दो आसन प्रधान कहे गये है- एक सिद्धासन और दूसरा पद्मासन॥७॥ योनिस्थानकमंघ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसे न्मेढ्रे पादमथैकमेव नियतं कृत्वा समं विग्रहम्। स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन्भ्रुवोरंतर मे तन्मोक्षकवाटभेदजनकं सिद्धासनं प्रोच्यते॥८॥ गुदा और मेढ्र (लिंग) के मध्य में योनिस्थान है जिसे कुण्डलिनी-स्थान भी कहा जाता है। साधक इस योनिस्थान को (बांए) पाव की एडी से दबाकर (दाए) पांव की एड़ी को मेढ्र पर लगाए और शरीर को बिल्कुल सीधा रखे। सभी इंद्रियों को वश में रखते हुए भ्रू-मध्य में अचल दृष्टि से देखता रहे तथा स्वयं भी स्थिर एवं अचल रहे। यही मोक्ष के द्वार को खोलनेवाला सिद्धासन कहा गया है॥८॥ वामोरूपरि दक्षिणं हि चरणं संस्थाप्य वामं तथा दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम्।