गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) गोरक्षनाथप्रणीतः ॐ गोरक्षशतकम् ॐ श्रीपरमगुरवे गोरक्षनाथाय नमः। ॐ गोरक्षशतकं वक्ष्ये भवपाशविमुक्तये। आत्मबोधकरं पुंसां विवेकद्वारकुञ्चिकाम्॥ १॥ गोरक्षशतकम् कहता हूँ। यह शतक संसार के बन्धन से मुक्त करानेवाला है। यह आत्मा के बोध को उत्पन्न करानेवाला तथा मनुष्यों के विवेक के द्वार को खोलने के लिए एक कुंजिका (चाबी) है॥ १॥ एतद्विमुक्तिसोपानमेतत्कालस्य वंचनम्। यद्ध्यावृत्तं मनो मोहादासक्तं परमात्मनि॥ २॥ यह गोरक्षशतकम् मुक्ति प्राप्ति का सोपान (साधन) है। इससे काल (मृत्यु) का वंचन (उल्लंघन) होता है (मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है, शरीर योगाभ्यास द्वारा स्वस्थ्य एवं परिपक्व हो जाता है और उसमें क्षीणता नहीं आती)। (इस शतक में वर्णित अभ्यास के द्वारा) मन मोह से मुक्त होकर परमात्मा में लग जाता है॥ २॥ द्विजसेवितशाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम्। शमनं भवतापस्य योगं भजति संज्जनः॥ ३॥ वेद कल्पतरु है। वेदरूपी कल्पतरू की शाखाओं का पण्डित जन सेवन (अनुशीलन) करते हैं जिसका फल यह योग है। सत्पुरुष इसका सेवन (साधन) करते है जिससे संसार का ताप (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) शमित (शान्त) हो जाता है॥ ३॥ आसनं प्राणसंयामः प्रत्याहारोऽथ धारणा। ध्यानं समाधिरेतानि योगांगानि भवन्ति षट्॥ ४॥