भारतकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

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( २२ ) गोरक्षनाथप्रणीतः दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णे च दक्षिणे। यशस्विनी वामकर्णे चानने वाप्यलंबुषा ॥ २१ ॥ कूहूश्च लिंगदेशे तु मूलस्थाने च शंखिनी। एवं द्वारमुपाश्रित्य तिष्ठन्ति दश नाडिकाः ॥ २२ ॥ सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः। इडापिंगलासुषुम्णा च तिस्रो नाड्य उदाहृताः ॥ २३ ॥ (नासिका के) वाम भाग में इडा और दक्षिण भाग में पिंगला नाड़ी है (इन दोनों के) मध्य में सुषम्ना है। गांधारी वाम नेत्र में और दक्षिण (दाहिने) नेत्र में हस्तिजिह्वा है। पूषा दाहिने कान में और यशस्विनी बाएं कान में है। मुख में अलम्बुषा है और लिंगदेश में कुहू हैं। शंखिनी मूलस्थान (मूलाधार) में है। इस प्रकार ये दस नाड़ियां (प्राणवायु के) द्वार में स्थित है। इडा, पिंगला और सुषम्ना प्राण के मार्ग में स्थित है और निरन्तर (शरीर में) प्राण का संचार करती रहती है। इनके देवता (इडा के) चन्द्रमा, (पिंगला के) सूर्य और (सुषुम्ना के) अग्नि है॥ २०-२३॥ प्राणापानौ समानश्च ह्युदानो व्यान एव च। नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनंजयः ॥ २४ ॥ नागाद्याः पंच विख्याताः प्राणाद्याः पंच वायवः। एते नाडिसहस्रेषु वर्तन्ते जीवरूपिणः ॥ २५ ॥ प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान (ये पांच) तथा नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनंजय (ये पांच) ऐसे कुल दस वायु है जो हजारों नाड़ियों में जीव रूप में रहते है॥ २४-२५॥ प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं च धावती। वामदक्षिणमार्गेण चंचलत्वान्न दृश्यते ॥ २६ ॥ जीव, प्राण और अपान के वश में होकर वाम और दक्षिण मार्ग से (इडा और पिंगला के द्वारा) नीचे से ऊपर एवं ऊपर से नीचे की ओर दौड़ता (चढ़ता- उतरता) रहता है जो चंचलता के कारण दिखाई नहीं पड़ता है॥ २६॥