भारतकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

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गोरक्षशतकम् ( २१ ) स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयः । स्वाधिष्ठानाख्यया तस्मान्मेढ़वाभिधीयते ।। १४ ।। 'स्व' शब्द प्राण का उद्गम है । (स्व शब्द से प्राण का बोध होता है।) स्वाधिष्ठान ही प्राण का आश्रम या स्थान है । अतः स्वाधिष्ठान पद ही मेढ़ कहा जाता है ।। १४ ।। तंतुना मणिवत्प्रोतो यत्र कंदः सुषुम्णया । तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् ।। १५ ।। सूत्र में पिरोए मणि के समान सुषुम्ना नाड़ी का केन्द्र है। यह नाभिमण्डल में स्थित (कन्द) मणिपूरक चक्र कहा जाता है ।। १५ ।। ऊर्ध्व मेढ्रादधो नाभेः कन्दयोनिः खगांडवत् । तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणि द्विसप्ततिः ।। १६ ।। मेढ्र से ऊपर और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे के सदृश्य कन्द-योनि है । यहां से (इस कन्दयोनि से) बहत्तर हजार नाड़ियां उत्पन्न होती है ।। १६ ।। तेषु नाडिसहस्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृताः । प्राधान्यात्प्राणवाहिन्यो भूयस्तत्र दश स्मृताः ।। १७ ।। इन सहस्रों नाड़ियों में बहत्तर हजार नाड़ियां मुख्य है और उन (बहत्तर हजार नाड़ियों) में भी दस प्राणवाहिनी नाड़ियां ही प्रधान है ।। १७ ।। इडा च पिंगला चैव सुषुम्णा च तृतीयाका । गांधारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी ।। १८ ।। अलंबुषा कुहूश्चैव शंखिनी दशमी स्मृता । एतन्नाडिमयं चक्रं ज्ञातव्यं योगिभिः सदा ।। १९ ।। (पहली) इडा, (दूसरी) पिंगला और तीसरी सुषुम्ना नाड़ी है । (इनके अतिरिक्त) गांधारी, हस्तिजिह्वा, पूषां, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू और शंखिनी ये दस नाड़ियां (प्रधान) है । योगियों को इन नाड़ियों से युक्त चक्र को सदा जानना चाहिये ।। १८-१९ ।। इडा वामे स्थिता भागे पिंगला दक्षिणे तथा । सुषुम्णा मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुषि ।। २० ।।