भारतकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

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गोरक्षशतकम् ( २३ ) आक्षिप्तो भुवि दण्डेन यथोच्चलति कंदुकः । प्राणापानसमाक्षिप्तस्तथा जीवोऽनुकृष्यते ॥ २७ ॥ रज्जुबद्धो यथा श्येनो गतोऽप्याकृष्यते पुनः । गुणबद्धस्तथा जीवः प्राणापानेन कृष्यते ॥ २८ ॥ अपानः कर्षति प्राणं प्राणोऽपान च कर्षति । ऊर्ध्वाधः संस्थितावेतौ यो जानाति स योगवित् ॥ २९ ॥ जिस प्रकार दण्ड के द्वारा आक्षिप्त (उछालने या ताड़ित) होने से गेंद पृथ्वी पर उछलती रहती है उसी प्रकार प्राण और अपान के द्वारा आक्षिप्त (आकृष्ट) होकर जीव (जीवात्मा) (क्षण भर भी) स्थिर नहीं रह पाता। जिस प्रकार डोरी से बंधा बाज पक्षी (डोरी ढील देने पर) ऊपर उड़ने लगता है। डोरी खिंचने पर नीचे आ जाता है उसी प्रकार (सत्व, रज, तम) गुणों (वासना और अविद्या) में बंधा हुआ जीव प्राण और अपान के द्वारा ऊपर नीचे खिंचता रहता है। अपान प्राण को खिंचता है और प्राण अपान को खिंचता है इस तरह ऊपर-नीचे खिंचते प्राण-अपान को जो संयोजित करना जानता है वहीं योगवेत्ता है ।। २७-२९ ।। कंदोर्ध्वं कुंडलीशक्तिरष्टधा कुंडलीकृता । ब्रह्मद्वारमुखं नित्यं मुखेनावृत्य तिष्ठति ।। ३० ।। कन्द (मेढ्र के ऊपर और नाभि के नीचे जो कन्द है, वह सभी नाड़ियों का उत्पत्ति-स्थान है ।) के ऊपर कुण्डलिनी शक्ति आठ प्रकार की होकर कुण्डलित रूप में ब्रह्मरन्ध्र को अपने मुख से आच्छादित करके (रोककर) स्थित है ।। ३० ।। प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मारुता हतां । प्रजीवगुणमादाय व्रजत्यूर्ध्वं सुषुम्णया ।। ३१ ।। वह (कुण्डलिनी) वह्नियोग से जागृत होकर मन और प्राण (वायु) के द्वारा आहत होकर अथवा उनके साथ डोर में बंधी सुई के समान सुषुम्ना-पथ में ऊपर उठती है ।। ३१ ।।