गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३० ) गोरक्षनाथप्रणीतः और वह (अमृत) सूर्य के मुख में जाने से बच जाता है ।। ६३ ।। संपीड्य रसनाग्रेण राजदंतबिलं महत् । ध्यात्वाऽमृतमयीं देवीं षण्मासेन कविर्भवेत् ।। ६४ ।। जिह्वा के अग्रभाग से राजदन्त के छिद्र को दबाकर और उस अमृतमयी देवी का ध्यान कर (जो योगी उस अमृत को धारण करता है वह) छः महीने में कवि हो जाता है ।। ६४ ।। अमृतापूर्णदेहस्य योगिनो द्वित्रिवत्सरात् । ऊर्ध्वं प्रवर्तते रेतोप्यणिमादिगुणोदयः ।। ६५ ।। योगी दो-तीन वर्षों तक देह को अमृतपूर्ण बनाये रखे तो उसका रेतस् ऊर्ध्वगामी हो जाता है और उस देह में अणिमादि सिद्धियों का उदय होने लगता है ।। ६५ ।। इन्धनानि यथा वह्निस्तैलैर्वर्त्तिं च दीपकः । तथा सोमकलापूर्णं देही देहं न मुंचति ।। ६६ ।। जिस प्रकार ईंधन होने पर अग्नि जलती रहती है, तेल से पूर्णवर्तिका होने पर दीपक जलता रहता है। उसी प्रकार सोमकला (अमृत) पूर्ण देह को देही (आत्मा) त्याग नहीं करती। (उस अमृतपूर्ण देह में वह बनी रहती है) ।। ६६ ।। आसनेन समायुक्तः प्राणायामेन संयुतः । प्रत्याहारेण संयुक्तो धारणाश्च समभ्यसेत् ।। ६७ ।। आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार से संयुक्त (इन तीनों के पूर्ण अभ्यास सिद्ध) होने पर धारणा का अभ्यास करना चाहिये ।। ६७ ।। हृदये पंचभूतानां धारणाश्च पृथक् पृथक् । मनसो निश्चलत्वेन धारणा च विधीयते ।। ६८ ।। हृदय में पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) की धारणा पृथक्-पृथक् करनी चाहिये । मन की निश्चलता से धारणा होती है। (एकाग्रता को ही धारणा कहा जाता है।) ।। ६८ ।।