गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 36, कुल 45 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोरक्षशतकम् ( २९ ) (तालुमूल में) अधोमुख चन्द्रमा अमृत बरसाता है और (नाभि देश में) ऊर्ध्वमुख सूर्य उसे ग्रस (सोख) लेता है। योगी को वह (विधि) जाननी चाहिये जिससे अमृत प्राप्त हो ॥ ५८ ॥ ऊर्ध्वनाभिरधस्तालु ऊर्ध्वभानुरधः शशी । करणं विपरीताख्यं गुरुवक्त्रेण लभ्यते ॥ ५९ ॥ नाभि ऊर्ध्व (ऊपर) और तालु अधः (नीचे) तथा सूर्य ऊपर और चन्द्रमा नीचे हो जाये, यह विपरीत करने की क्रिया (किसी योगी) गुरु के मुख से जाननी चाहिये ॥ ५९ ॥ त्रिधा बद्धो वृषो यत्र रौरवीति महारवनम् । अनाहतं च तच्चक्रं हृदये योगिनो विदुः ॥ ६० ॥ वृषभ (सांड़े) तीन तरफ से बंधा हुआ है और घोर गर्जना कर रहा है। हृदय में यह अनाहत चक्र है जिसे योगी लोग जानते है ॥ ६० ॥ अनाहतमतिक्रम्य चाक्रम्य मणिपूरकम् । प्राप्ते प्राणे महापद्मं योगित्वममृतायते ॥ ६१ ॥ मणिपूर और अनाहत के अतिक्रमण होने पर प्राण की अवस्थिति महापद्म में होती है। (अनाहत में पहुचने पर ही) योगित्व (योगी कहलाने लायक) की संज्ञा होती है जो अमृतमय है ॥ ६१ ॥ विशब्दः संस्मृतो हंसो निर्मलः शुद्ध उच्यते । अतः कण्ठे विशुद्धाख्यं चक्रं चक्रविदो विदुः ॥ ६२ ॥ विशब्द (निरशब्दता) हंस का द्योतक और निर्मलता को शुद्धि कहा जाता है। इसलिये कण्ठ में विशुद्धि चक्र है। (इसे शुद्धि का चक्र भी कहा जाता है जहां सब कुछ शुद्ध और संतुलित हो जाता है) इसे (इस तथ्य को) चक्रों के ज्ञाता जानते है ॥ ६२ ॥ विशुद्धे परमे चक्रे धृत्वा सोमकलाजलम् । मासेन न क्षयं याति वंचयित्वा मुखं रवेः ॥ ६३ ॥ (विशुद्धि चक्र के जागृत होने पर) परम विशुद्धि चक्र में चन्द्रमा की कलाओं का जल (अमृत) धारण करने पर महीने भर उसका क्षय नहीं होता