गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) गोरक्षनाथप्रणीतः प्राणायामो भवत्येवं पातकेन्धनपावकः। एनोम्बुधिमहासेतुः प्रोच्यते योगिभिः सदा ॥ ५३ ॥ इस प्रकार प्राणायाम पातकरूपी ईंधन के लिये अग्नि है यह पापों को जला डालता है। यह पापों के समुद्र के लिये महासेतु है। योगीजन सदा ऐसा कहते हैं ॥ ५३ ॥ आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम् । विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण सर्वदा ॥ ५४ ॥ योगी आसन से रोग नष्ट करता है, प्राणायाम से पातक नष्ट करता है और प्रत्याहार से मानसिक विकार नष्ट करता है ॥ ५४ ॥ चन्द्रामृतमयी धारां प्रत्याहरति भास्करः । तत्प्रत्याहरणं तस्य प्रत्याहारः स उच्यते ॥ ५५ ॥ चन्द्रमा की अमृतधारा को सूर्य रोक देता है अर्थात् सुखा देता है या नष्ट कर देता है। जो इस अवरोध को रोक दे उसे प्रत्याहार कहा जाता है ॥ ५५ ॥ एका स्त्री भुज्यते द्वाभ्यामागता सोममंडलात् । तृतीयो यो भवेत्ताभ्यां स भवत्यजरामरः ॥ ५६ ॥ सोममण्डल से आयी हुई एक स्त्री (चन्द्रामृतमयी धारा) दो के द्वारा युक्त होती है। उन दोनों से भिन्न तीसरे के होने से वह (योगी) अजर-अमर हो जाता है। (यह इस योग की एक प्रक्रिया है जो सुधा और नाड़ियों से सम्बन्धित है जिसे साधकों को उस सम्प्रदाय के योगियों से जानना चाहिये) ॥ ५६ ॥ नाभिदेशे भवत्येको भास्करो दहनात्मकः । अमृतात्मा स्थितो नित्यं तालुमूले च चन्द्रमाः ॥ ५७ ॥ नाभि-स्थान में दहन (जलाकर भस्मसात) करनेवाला सूर्य स्थित है और तालुमूल (तालु मध्य) में अमृतात्मा (अमृत निस्पन्दित करते हुये) चन्द्रमा स्थित है ॥ ५७ ॥ वर्षत्यधोमुखश्चन्द्रो ग्रसत्यूर्ध्वमुखो रविः । ज्ञातव्यं करणं तत्र येन पीयूषमाप्यते ॥ ५८ ॥