भारतकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 45 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

गोरक्षशतकम् ( २७ ) प्रणव के साथ रेचक, पूरक और कुम्भक तीन प्रकार से प्राणायाम होता है। इसमें बारह मात्रा का अनुपात होना चाहिये ॥ ४७ ॥ द्वादशाधमके मात्रा मध्यमे द्विगुणास्ततः । उत्तमे त्रिगुणा मात्राः प्राणायामस्य निर्णयः ॥ ४८ ॥ बारह मात्रा के अनुपातवाला प्राणायाम अधम (निम्न) होता है, इसके द्विगुण (चौबीस मात्रा के अनुपातवाला) मध्यम और उसके त्रिगुण (छत्तीस मात्रा के अनुपातवाला) उत्तम होता है ॥ ४८ ॥ अधमे च घनो घर्मः कम्पो भवति मध्यमे । उत्तमे त्रिगुणा मात्राः प्राणायामस्य निर्णयः ॥ ४९ ॥ अधम प्राणायाम में अतिशय स्वेद (पसीना) होता है, मध्यम में शरीर में कम्पन होता है और उत्तम में बद्धपद्मासन में ही (कुछ ऊपर) उठ जाता है ॥४९॥ अंगानां मर्दनं शस्तं श्रमसंजातवारिणा । कट्वम्ललवणत्यागी क्षीरभोजनमाचरेत् ॥ ५० ॥ प्राणायाम के श्रम से उत्पन्न स्वेद (पसीने) को (शरीर के) अंगों में मलना प्रशस्त (लाभदायक) है। (प्राणायाम-साधना काल में) कटु, अम्ल तथा लवण पदार्थ का त्याग करना चाहिये और दुग्ध पदार्थ का भोजन करना चाहिये ॥५०॥ मन्दम् मन्दम् पिबेद्वायु मन्दम् मन्दम् वियोजयेत् । नाधिकं स्तम्भयेद्वायुं न च शीघ्रं विमोचयेत् ॥ ५१ ॥ धीरे-धीरे वायु-पान करना चाहिये और धीरे-धीरे ही उसे ग्रहण करना चाहिये। अधिक (ज्यादा देर तक) स्तम्भन (कुम्भक) नहीं करना चाहिये तथा शीघ्रता से रेचन भी नहीं करना चाहिये ॥ ५१ ॥ ऊर्ध्वमाकृष्य चापानं वात प्राणे नियोजयेत् । मूर्धानं नीयते शक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५२ ॥ अपान वायु को ऊपर खींचकर प्राण में नियोजित करना चाहिये। (इसकी) शक्ति से (चेतना की) ऊर्ध्वगामिता होती है और सभी पापों से मुक्ति मिलती है ॥ ५२ ॥