भारतकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

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( २६ ) गोरक्षनाथप्रणीतः अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुये एकाकी (एकान्त में अकेला) योगी को प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये ॥ ४१ ॥ प्राणो देहस्थितो वायुरायामस्तन्निबन्धनम्। एकश्वासमयी मात्रा तद्योगो गगनायते ॥ ४२ ॥ शरीर में स्थित प्राणवायु तथा अपान वायु का निरोध पूर्वक मिलना और एक श्वास हो जाना- यह योग ऊर्ध्वगामी एवं उत्कृष्ट है। (प्राण और अपान का मिलना एक श्रेष्ठ योग है ॥ ४२ ॥ बद्धपद्मासनो योगी प्राणं चंद्रेण पूरयेत्। धारयित्वा यथाशक्ति भूयः सूर्येण रेचयेत् ॥ ४३ ॥ योगी को बद्धपद्मासन में बैठकर चन्द्रनाड़ी (वाम नासिकारन्ध्र) से प्राणवायु को भीतर खिंचकर कुम्भक करना चाहिये और उसके बाद सूर्य नाड़ी (दक्षिण नासिकारन्ध्र) से उसे बाहर निकालना (रेचक करना) चाहिये ॥ ४३ ॥ अमृतोदधिसंकाशं क्षीरोदधवलप्रभम्। ध्यात्वा चंद्रमयं बिम्बं प्राणायामे सुखी भवेत् ॥ ४४ ॥ अमृत के समुद्र की आभा सदृश और दुग्ध-समुद्र की धवल प्रभा-सदृश चन्द्र-बिम्ब का ध्यान कर प्राणायाम करने से साधक सुखी होता है ॥ ४४ ॥ प्राणं सूर्येण चाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः। कुंभयित्वा विधानेन भूयश्चन्द्रेण रेचयेत् ॥ ४५ ॥ सूर्यनाड़ी (दक्षिण नासिका-छिद्र) से प्राणवायु धीरे-धीरे खींचकर उदर को भरना चाहिये, फिर विधिपूर्वक कुम्भक करना चाहिये। पुनः चन्द्रनाड़ी (वाम नासिका-छिद्र) से (धीरे-धीरे रेचक करना चाहिये) ॥ ४५ ॥ प्रज्ज्वलज्ज्वलन ज्वाला पुञ्जमादित्यमण्डलम्। ध्यात्वा नाभिस्थितं योगी प्राणायामे सुखी भवेत् ॥ ४६ ॥ नाभि में स्थित अत्यन्त प्रज्ज्वलित अग्नि की ज्वाला के पुञ्ज से युक्त सूर्यमण्डल का ध्यान कर प्राणायाम करने से योगी सुखी होता है ॥ ४६ ॥ रेचकः पूरकश्चैव कुम्भकः प्रणवात्मकः। प्राणायामो भवेत्त्रेधा मात्राद्वादशसंयुतः ॥ ४७ ॥