भारतकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

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गोरक्षशतकम् ( २५ ) जालन्धर बन्ध में कण्ठ का संकोचन करना होता है। (संकुचित कण्ठ में ठुड्डी को लगा दिया जाता है) जालन्धर बन्ध से (बिन्दु-स्थित चन्द्रमा से निस्पन्दित होने वाला) अमृत (मणिपुर में स्थित) अग्नि में नहीं गिरता (गिरकर भस्म नहीं होता) और वायु भी प्रकुपित नहीं होती ॥ ३६ ॥ पार्ष्णिभागेन संपीड्य योनिमाकुंचयेद्गुदम् । अपानमूर्ध्वमाकृष्य मूलबंधो निगद्यते ॥ ३७ ॥ पांव की एड़ी से योनिस्थान को ठीक से दबाकर गुदा को सिकोड़ना चाहिये और अपान वायु को ऊपर की ओर खिंचना चाहिये (तथा प्राणवायु से मिलाना चाहिये। यही मूलबन्ध है) इसे मूलबन्ध कहा जाता है ॥ ३७ ॥ यतः कालभयात् ब्रह्मा प्राणायामपरायणः । योगिनो सुनयश्चैव ततः प्राणं निबंधयेत् ॥ ३८ ॥ काल (मृत्यु) के भय से ब्रह्मयोगी और मुनिगण प्राणायाम का अभ्यास करते रहते है। इसलिये (सभी को) प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये ॥ ३८॥ चले वाते चलं सर्वं निश्चले निश्चलं भवेत् । योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निबंधयेत् ॥ ३९ ॥ जब तक (शरीर में) वायु (प्राण) चंचल है तब तक सब कुछ चंचल रहता है, उसके निश्चल (स्थिर) होने पर अन्य सभी स्थिर हो जाते है। इससे योगी स्थाणुत्व (निश्चलता, स्थिरता) प्राप्त करता है, इसलिये प्राणायाम करना चाहिये ॥ ३९ ॥ षट्त्रिंशदंगुलं हंसः प्रयाणं कुरुते बहिः । वामदक्षिणमार्गेण ततः प्राणोऽभिधीयते ॥ ४० ॥ (प्राण-रूप वायु) हंस वाम और दक्षिण नासा-रन्ध्रों से छत्तीस अंगुल (की दूरी तक) बाहर निकलता है, इसलिये (वायु को) प्राण कहा जाता है ॥ ४० ॥ बद्धपद्मासनो योगी नमस्कृत्य गुरुं शिवम् । नासाग्रदृष्टिरेकाकी प्राणायामं समभ्यसेत् ॥ ४१ ॥ बद्धपद्मासन में बैठकर शिव-रूप गुरु को नमस्कार कर नासिका के