गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोरक्षशतकम् ( ३१ ) या पृथ्वी हरितालदेशरुचिरा पीता लकरान्विता संयुक्ता कमलासनेन हि चतुष्कोणा हृदि स्थायिनी । प्राणं तत्र विनीय पंचघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा स्तम्भकरी सदा क्षितिजयं कुर्याद्भुवो धारणा ।। ६९ ।। जिसे पृथ्वी (तत्त्व या महाभूत) कहते है वह (मूलाधार) में कमलासन (चार दलों वाले कमल) पर हरिताल की तरह पीली आभा से युक्त पीले रंग के चतुष्कोण के मध्य पीताभलंकार (लं बीज से युक्त) है वहां पांच घटिका तक प्राण और चित्त को स्थिर करके उसकी धारणा करनी चाहिये। यह स्तम्भकारी है और इसके द्वारा पृथ्वी (तत्त्व या भूत) पर जय प्राप्त करनी चाहिये। यही पृथ्वी धारणा है ।। ६९ ।। अर्धेन्दुप्रतिमं च कुंदधवलं कंठेबुतत्त्वं स्थितं यत्पीयूषवकार बीज सहितं युक्तं सदा विष्णुना। प्राणं तत्र विनीय पंचघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा दुर्वहकालकूटजरणा स्याद्वारिणी धारणा ।। ७० ।। (स्वाधिष्ठान चक्र में) जहां अर्ध चन्द्रमा है उसके कण्ठ (ऊपरी भाग में) कुन्द-पुष्प के समान धवल जल तत्त्व स्थित है और वहां विष्णु के साथ अमृत-स्वरूप वकार बीज है। वहां पर पांच घटिका तक प्राण और चित्त को स्थित कर धारणा करनी चाहिये। यह दुर्वह (महाकठिन) कालकूट (हलाहल विष) को भी क्षीण करनेवाला है। यह वारिणी (जल महाभूत की) धारणा है।। ७० ।। यत्तालस्थितमिंद्रगोपसदृशं तत्त्वं त्रिकोणोज्ज्वलं तेजोरेफमयं प्रवालरुचिरं रुद्रेण यत्संगतम् । प्राणं तत्र विनीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा वह्निजयं सदा विदधते वैश्वानरी धारणा ।। ७१ ।। (मणिपुर चक्र में) जल से भरे बादलों के रंग वाले कमलों के मध्य रक्तिम त्रिकोण में रक्त वर्ण का रकार (रं बीज) है जिस पर रक्त वर्णी रुद्र हैं वहां पर पांच घटिका तक प्राण और चित्त स्थिर कर धारणा करने से अग्नि-जय होती है। यह वैश्वानरी (अग्नि-भूत की) धारणा है ।। ७१ ।।