भारतकोश
गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 45 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 39

. ( ३२ ) गोरक्षनाथप्रणीतः यद्भिन्नांजनपुंजसान्निभमिदं तत्त्वं भ्रुवोरन्तरे वृत्तं वायुमयं यकारसहितं यत्रेश्वरो देवता। प्राणं तत्र विनीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा खे गमनं करोति यमिनां स्याद्वायवी धारणा ।। ७२ ।। (अनाहत चक्र में) जहां भिन्नाञ्जनपुंजसान्निभ (धूम वर्ण का) वायु तत्त्व का यकार (यं बीज) है। और उसके देवता ईश्वर है, वहां पांच घटिका, तक प्राण और चित्त को स्थिर कर धारणा करनी चाहिये जिससे योगी आकाश गमन में समर्थ होता है। यह वायवी (वायु भूत की) धारणा है ।। ७२ ।। आकाशं सुविशुद्धवारिसदृशं यद्ब्रह्मरन्ध्रे स्थितं, तत्राद्येन सदाशिवेन सहितं शांतं हकाराक्षरम्। प्राणं तत्र विनीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वयं धारये- देषा मोक्षकवाटपाटनपटुः प्रोक्ता नभोधारणा ।। ७३ ।। (विशुद्धि चक्र में) जहां विशुद्ध जल के सदृश (उज्ज्वल) आकाश-तत्त्व स्वरूप, हकार (हं बीज) शान्त सदाशिव के साथ स्थित है, वहां पांच घटिका तक प्राण और चित्त को स्थिर कर धारणा करनी चाहिये। यह धारणा मोक्ष के कपाट को खोलने वाली है। इसे नभोधारणा (आकाश-भूत की धारणा) कहते है ।। ७३ ।। स्तम्भनी द्रावणी चैव दहनी भ्रामणी तथा। शोषणी च भवन्त्येव भूतानां पंचधारणाः ।। ७४ ।। स्तम्भनी, द्राविणी, दहनी, भ्रामणी और शोषणी ये (पंच) भूतों की पांच धारणाएं है ।। ७४ ।। कर्मणा मनसा वाचा धारणाः पंच दुर्लभाः। विधाय सततं योगी सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। ७५ ।। कर्म, मन और वाणी से (अभ्यास करने योग्य) ये पांच धारणाएं दुर्लभ है। इनका सतत् अभ्यास करने से योगी सभी पापों से मुक्त हो जाता है ।।७५ ।। सर्व चिंतासमावर्ति योगिनो हृदि वर्तते । यत्तत्वे निश्चितं चेतस्तत्तु ध्यानं प्रचक्षते ।। ७६ ।।