गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोरक्षशतकम् ( ३३ ) योगियों के हृदय में सभी चिन्तनो में जो एक धातु निर्मल चिन्तन है। उसमें निश्चित (एकतान रूप में) चित्त लग जाये उसे ध्यान कहते है ।। ७६ ।। द्विधा भवति तद्ध्यानं सगुणं निर्गुणं तथा । सगुणं वर्णभेदेन निर्गुणं केवलं विदुः ।। ७७ ।। वह ध्यान दो प्रकार का है। एक सगुण और दूसरा निर्गुण। सगुण में वर्णभेद (रूपात्मक भेद) होता है, किन्तु निर्गुण में केवल (रूपाभाव-आकार- राहित्य) होता है ।। ७७ ।। आधारं प्रथमं चक्रं तप्तकांचनसन्निभम् । नासाग्रे दृष्टिमादाय ध्यात्वा मुंचति किल्बिषम् ।। ७८ ।। तप्त स्वर्ण के समान (पीले रंग का) आधार (मूलाधार) प्रथम चक्र है। नासाग्र दृष्टि रखकर उसका ध्यान करने से किल्विष (दोष, रोग) नष्ट हो जाता है ।। ७८ ।। स्वाधिष्ठानं द्वितीयं तु सन्माणिक्यसुशोभनम् । नासाग्रे दृष्टिमादाय ध्यात्वा मुंचति पातकम् ।। ७९ ।। माणिक्य-वर्ण (सिन्दूरी रंग का) स्वाधिष्ठान द्वितीय चक्र है। नासाग्र- दृष्टि रखकर उसका ध्यान करने से पातक नष्ट हो जाता है ।। ७९ ।। तरुणादित्यसंकाशं चक्रं च मणिपूरकम् । नासाग्रे दृष्टिमादाय ध्यात्वा संक्षोभयेज्जगत् ।। ८० ।। तरुण सूर्य के सदृश वर्ग (रक्त वर्ण का) मणिपूरक (तृतीय) चक्र है। नासाग्र दृष्टि रखकर उसका ध्यान करने से (योगी जगत् को संक्षोभित करने में समर्थ होता है।) ।। ८० ।। • (श्लोक संख्या ८१ लुप्त है) ✿ ✿ ✿ विद्युत्प्रभावं हृत्पद्मे प्राणायामविभेदनैः । नासाग्रे दृष्टिमादाय ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ।। ८२ ।। प्राणायाम के द्वारा भेदन कर विद्युत की आभा (रक्तोज्ज्वल अनाहतं) हृदयपद्म् में नासाग्र दृष्टि रखकर ध्यान करने से (योगी) ब्रह्ममय हो जाता है ।। ८२ ।।