गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)
Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४ ) गोरक्षनाथप्रणीतः संततं घटिकामध्ये विशुद्धं चामृतोद्भवम् । नासाग्रे दृष्टिमादाय ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ।। ८३ ।। घण्टिका के मध्य (उपजिह्वा के मध्य दीपक प्रभा वाले) विशुद्धि चक्र जहां निरन्तर अमृत का उद्भव होता रहता है, नासाग्र दृष्टि रखकर उस पर ध्यान करने से (योगी) ब्रह्ममय होता है ।। ८३ ।। भ्रुवोर्मध्ये स्थितं देवं स्निग्धमौक्तिकसन्निभम् । नासाग्रे दृष्टिमादाय ध्यात्वाऽऽनंदमयो भवेत् ।। ८४ ।। दोनों भौंहों के मध्य (आज्ञा चक्र में) में माणिक्य-प्रज्ञा के सदृश (इतराख्य लिंग के साथ) देदीप्यमान देव (परमेश्वर) स्थित है। नासाग्र दृष्टि रखकर वहां ध्यान करने से (योगी) आनन्दमय हो जाता है ।। ८४ ।। निर्गुणं च शिवं शांतं गगने विश्वतोमुखम् । नासाग्रे दृष्टिमादाय ध्यात्वा दुःखाद्विमुच्यते ।। ८५ ।। गगन-रूप (सहस्रार) में विश्वोन्मुख निर्गुण परम शान्त शिव है। नासाग्र-दृष्टि रखकर वहां ध्यान करने से सभी दुःखों से मुक्ति मिल जाती है ।। ८५ ।। गुदं मेढ्रं च नाभिं च हृत्पद्मं च तदूर्ध्वतः । घंटिकां लंपिकास्थानं भ्रूमध्ये परमेश्वरम् ।। ८६ ।। निर्मलं गगनाकारं मरीचिजलसन्निभम् । आत्मानं सर्वगं ध्यात्वा योगी योगमवाप्नुयात् ।। ८७ ।। गुदा, मेढ्र, नाभि, हृदयपद्म तथा उसके ऊपर घण्टिका और लम्पिका स्थान (तालु स्थान) में भ्रूमध्य में परमेश्वर तथा अतिशय प्रकाश से भास्वर गगनस्वरूप निर्मल-सर्वव्यापी आत्मा (परम आत्मा) का ध्यान करने से योगी को योग (समाधि) की प्राप्ति होती है ।। ८६-८७ ।। कथितानि यथैतानि ध्यानस्थानानि योगिनाम् । उपाधितत्त्वयुक्तानि कुर्वन्त्यष्टगुणोदयम् ।। ८८ ।। योगियों के लिये ये ध्यान-स्थान कहे गये है ये आठ गुणों के उदय को उपाधि और तत्त्व से युक्त कर देते है ।। ८८ ।।