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गोरक्षशतकम् (गुरु गोरखनाथ - षडङ्ग हठयोग, कुण्डलिनी एवं प्राणायाम विधान सटीक)

Goraksha Shatakam of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (टीकाकार: पं. मोतीलाल खद्दर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

( ३४ ) गोरक्षनाथप्रणीतः संततं घटिकामध्ये विशुद्धं चामृतोद्भवम् । नासाग्रे दृष्टिमादाय ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ।। ८३ ।। घण्टिका के मध्य (उपजिह्वा के मध्य दीपक प्रभा वाले) विशुद्धि चक्र जहां निरन्तर अमृत का उद्भव होता रहता है, नासाग्र दृष्टि रखकर उस पर ध्यान करने से (योगी) ब्रह्ममय होता है ।। ८३ ।। भ्रुवोर्मध्ये स्थितं देवं स्निग्धमौक्तिकसन्निभम् । नासाग्रे दृष्टिमादाय ध्यात्वाऽऽनंदमयो भवेत् ।। ८४ ।। दोनों भौंहों के मध्य (आज्ञा चक्र में) में माणिक्य-प्रज्ञा के सदृश (इतराख्य लिंग के साथ) देदीप्यमान देव (परमेश्वर) स्थित है। नासाग्र दृष्टि रखकर वहां ध्यान करने से (योगी) आनन्दमय हो जाता है ।। ८४ ।। निर्गुणं च शिवं शांतं गगने विश्वतोमुखम् । नासाग्रे दृष्टिमादाय ध्यात्वा दुःखाद्विमुच्यते ।। ८५ ।। गगन-रूप (सहस्रार) में विश्वोन्मुख निर्गुण परम शान्त शिव है। नासाग्र-दृष्टि रखकर वहां ध्यान करने से सभी दुःखों से मुक्ति मिल जाती है ।। ८५ ।। गुदं मेढ्रं च नाभिं च हृत्पद्मं च तदूर्ध्वतः । घंटिकां लंपिकास्थानं भ्रूमध्ये परमेश्वरम् ।। ८६ ।। निर्मलं गगनाकारं मरीचिजलसन्निभम् । आत्मानं सर्वगं ध्यात्वा योगी योगमवाप्नुयात् ।। ८७ ।। गुदा, मेढ्र, नाभि, हृदयपद्म तथा उसके ऊपर घण्टिका और लम्पिका स्थान (तालु स्थान) में भ्रूमध्य में परमेश्वर तथा अतिशय प्रकाश से भास्वर गगनस्वरूप निर्मल-सर्वव्यापी आत्मा (परम आत्मा) का ध्यान करने से योगी को योग (समाधि) की प्राप्ति होती है ।। ८६-८७ ।। कथितानि यथैतानि ध्यानस्थानानि योगिनाम् । उपाधितत्त्वयुक्तानि कुर्वन्त्यष्टगुणोदयम् ।। ८८ ।। योगियों के लिये ये ध्यान-स्थान कहे गये है ये आठ गुणों के उदय को उपाधि और तत्त्व से युक्त कर देते है ।। ८८ ।।

गोरक्षशतकम् ( ३५ ) उपाधिश्च तथा तत्त्वं द्वयमेवमुदाहृतम् । उपाधिः प्रोच्यते वर्णस्तत्त्वमात्माभिधीयते ॥ ८९ ॥ उपाधि और तत्त्व ये दोनों पृथक हैं। वर्ण (आकार) को उपाधि कहा जाता है तथा तत्त्व को आत्मा कहते हैं ॥ ८९ ॥ उपाधिरन्यथाज्ञानं तत्त्वं संस्थिमयन्यथा। समस्तोपाधिविध्वंसि सदाभ्यासेन योगिनाम् ॥ ९० ॥ उपाधि अन्यथाज्ञान (मिथ्याज्ञान) है, किन्तु तत्व वास्तविक ज्ञान है। योगी निरन्तर अभ्यास से सभी उपाधियों का विध्वंस (नष्ट) करते है ॥ ९० ॥ आत्मवर्णेन भेदेन दृश्यते स्फाटिको मणिः । मुक्तो यः शक्तिभेदेन सोऽयमात्मा प्रशस्यते ॥ ९१ ॥ स्फटिक मणि पर आत्मवर्ण (जिस वर्ण का प्रतिबिम्ब पड़ता है) उसी वर्ण (उसी रंग) का यह दिखता है। (आत्मा के साथ भी ऐसा ही होता है।) वर्ण (रंग संस्कार आदि उपाधियों) के शक्ति-भेद से जो मुक्त है, वही आत्मा प्रशस्त है ॥ ९१ ॥ निरातंकं निरालंबं निष्प्रपंचं निराश्रयम् । निरामयं निराकारं तत्त्वं तत्त्वविदो विदुः ॥ ९२ ॥ निरातंक (निर्भय), निरालम्ब (आलम्बन रहित), निष्प्रपंच (प्रपंच से भिन्न), निराश्रय (आश्रय रहित), निरामय (रोग रहित), निराकार (किसी भी प्रकार के आकार से रहित) स्वरूप वाला तत्व (आत्मा) है। तत्वविद् ऐसा जानते है ॥ ९२ ॥ शब्दाद्याः पंच या मात्रा यावत्कर्णादिषु स्मृताः । तावदेव स्मृतं ध्यानं तत्समाधिरतः परम् ॥ ९३ ॥ शब्द आदि (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) कर्ण आदि इन्द्रियों के विषय है। यहां तक स्मृति ध्यान है। इसके उपरान्त समाधि है ॥ ९३ ॥ यदा संक्षीयते प्राणो मानसं च विलीयते । तदा समरसैकत्वं समाधिरभिधीयते ॥ ९४ ॥

.( ३६ ) गोरक्षनाथप्रणीतः जब प्राण क्षीण हो जाते है, मन विलीन हो जाता है। तब समरसत्व (एकरसत्व) हो जाता है, वही समाधि है ।। ९४ ।। (श्लोक संख्या ९५ लुप्त है) ❁ ❁ ❁ धारणाः पंचनाड्यस्तु ध्यानं च षष्टिनाडिकाः । दिनद्वादशकेनैव समाधिः प्राणसंयमः ।। ९६ ।। धारणा पांच नाड़ी (दण्ड-चौबीस मिनट का एक दण्ड या एक नाड़ी होती है)। और साठ नाड़ी तक ध्यान होता है। बारह दिनों तक समाधि होती है। यही तक प्राण-संयम होता है ।। ९६ ।। न गंधं न रसं रूपं न स्पर्शं न च निःस्वनम् । आत्मानं न परं वेत्ति योगी युक्तः समाधिना ।। ९७ ।। जब योगी के समक्ष (उसके चित्त में) न गन्ध रहती है, न रस रहता है न रूप रहता है, न स्पर्श रहता है, न शब्द रहता है। और वह आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं जानता (देखता) तो यह समाधि है। (ऐसा होना समाधि में ही संभव है। और ऐसा योगी मुक्त योगी है।) ।। ९७ ।। खाद्यते न च कालेन बाध्यते न च कर्मणा । साध्यते न च केनापि योगी युक्तः समाधिना ।। ९८ ।। समाधि से युक्त ऐसा योगी काल (मृत्यु) के द्वारा कवलित नहीं होता कर्म से बाधित नहीं होता, और किसी के द्वारा साधित भी नहीं होता ।। ९८ ।। निर्मलं निश्चलं नित्यं निष्क्रिय निर्गुणं महत् । व्योमविज्ञानमानंदं ब्रह्म ब्रह्मविदो विदुः ।। ९९ ।। ब्रह्म निर्मल, निश्चल, नित्य, निष्क्रिय, महत् व्योम-रूप, विज्ञान-रूप आनन्द-रूप है। ब्रह्मविद् यह जानते है ।। ९९ ।। दुग्धे क्षीरं घृते सर्पिरग्नौ वह्निरिवार्पितः । अद्वयत्वं व्रजेन्नित्यं योगवित्परमे पदे ।। १०० ।। जिस प्रकार दुग्ध में क्षीर, घृत में सर्पिस (घृत) और अग्नि में वह्नि

गोरक्षशतकम् ( ३७ ) अर्पित किया जाता है । (युग्म के दोनों शब्द एक ही अर्थ के द्योतक है ) उसी प्रकार योगविद् परम पद में अद्वयभाव से नित्य निवास करते हैं ।। १०० ।। भवभयवने वह्निर्मुक्तिसोपानमार्गतः । अद्वयत्वं व्रजेन्नित्यं योगवित्परमे पदे ।। १०१ ।। संसार के भय के जंगल में अग्नि के समान, मुक्ति के सोपान- मार्ग से परम पद में अवस्थित होकर योगविद् नित्य (निरन्तर) अद्वय रूप में रहते हैं ।। १०१ ।। ।। इति श्री गोरक्षनाथप्रणीतः गोरक्षशतकम् समाप्तम् ।।

श्री पीताम्बरा पीठ ह्लीं दतिया (म.प्र.) PRINTED AT : SHIV SHAKTI PRESS, NAGPUR