गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें...अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो भगवान् विष्णुः। अधिकरणम् ७ : तदुपर्यधिकरणम् (देवानामपि ब्रह्मविद्यायामधिकारः) विषय-शीर्षक : देवता भी परमपुरुष श्रीभगवान् की उपासना/ध्यान कर सकते हैं। श्रीमद्गोविन्दभाष्यम् — श्रील बलदेवविद्याभूषण-विरचिता भूमिका : विषयः — पूर्व अधिकरण में अङ्गुष्ठमात्र परिमाण वाले पुरुष को परमपुरुष भगवान् सिद्ध करने हेतु, श्रुति-प्रमाणों द्वारा यह दर्शाया गया था कि मनुष्यों का ही परमपुरुष के ध्यान में अधिकार है। इस प्रमाण से यह भ्रान्ति उत्पन्न हो सकती है कि केवल मनुष्यों को ही परमपुरुष की उपासना का अधिकार है। अतः उस पूर्वपक्षीय धारणा का निराकरण करते हुए, अन्य (देवताओं) का भी परमपुरुष के ध्यान में अधिकार सिद्ध किया जाता है। अत्र बृहदारण्यकोपनिषदि (१।४।१०) श्रूयते — "तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणाम् ॥" (हिन्दी अनुवाद : "देवताओं में से जिसने भी उस परब्रह्म को जाना, वह वही ब्रह्मस्वरूप हो गया; ऋषियों में से जिसने जाना, वह भी वही हुआ; तथा मनुष्यों में से जिसने जाना, वह भी वही हो गया।") तथा च बृहदारण्यकोपनिषदि (४।४।१६) पुनः श्रूयते — "तद् देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥" (हिन्दी अनुवाद : "समस्त ज्योतियों की परम ज्योति, अमृत और आयुःस्वरूप उस परमपुरुष की देवगण उपासना करते हैं।") संशयः — किं मनुष्याणामिव देवादीनामपि परमपुरुषस्य ब्रह्मविद्यायामुपासनायामधिकारोऽस्ति न वेति? (संशय : क्या मनुष्यों के समान देवताओं का भी परमपुरुष भगवान् के ध्यान/उपासना में सामर्थ्य व अधिकार सम्भव है अथवा नहीं?) पूर्वपक्षः — न देवादीनामधिकारः सम्भवति; विग्रहवत्त्वाद्यभावात्। इन्द्रादिदेवास्तु मन्त्रात्मका एव, न तु तेषां भौतिकावयवेन्द्रियाणि सन्ति। करणाभावाच्च तेषां न विषयेष्वर्थित्वं (कामना), नापि मोक्षे वैराग्यादिसामर्थ्यमस्ति; अतः कथमधिकारः स्यात्। सिद्धान्तः — अत्रोच्यते, देवादीनामप्यधिकारोऽस्त्येव। तदेतत् सूत्रेण प्रतिपाद्यते — ब्रह्मसूत्रम् — अध्याय १, पाद ३, सूत्र २६ : तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात् ॥ १।३।२६ ॥ (हिन्दी अनुवाद : भगवान् बादरायण व्यास का मत है कि मनुष्यों से ऊपर देव आदि का भी ब्रह्मविद्या में अधिकार है, क्योंकि उनमें भी ज्ञान, अर्थित्व तथा सामर्थ्य का सद्भाव सम्भव है।)