गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबृहदारण्यकोपनिषद् (४.४.१६) प्रमाण एवं पूर्वपक्ष उपसंहार: बृहदारण्यकोपनिषद् (४.४.१६) में कहा गया है— «तद् देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम्» अर्थात् समस्त देवता परमेश्वर की, जो ज्योतियों की भी परम ज्योति हैं, उपासना करते हैं। इस श्रुति-वचन के अनुसार देवता केवल परम तेजोमय परब्रह्म की ही उपासना करते हैं, अतः वे स्वाभाविक रूप से मधुविद्या आदि गौण अथवा आनुषंगिक उपासनाओं में प्रवृत्त नहीं होते। यह व्याख्या प्रतिपादित करती है कि मनुष्य की भाँति देवता भी केवल परब्रह्म के ध्यान में ही स्वाभाविक रुचि रखते हैं, तथा वे अन्य किसी प्रकार की सीमित उपासना से सर्वथा विरक्त रहते हैं। इस प्रकार पूर्वपक्ष का निरूपण करने के उपरान्त, अब भगवान् व्यासदेव (सूत्रकार) अपना सिद्धान्त मत व्यक्त करते हैं—
मध्वाद्यधिकरणम्
सूत्र ३३: भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ ३३ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ:
- भावम् = (उपासना के अधिकार का) सद्भाव अथवा अस्तित्व;
- तु = किन्तु (पूर्वपक्ष के संशय के निवारणार्थ);
- बादरायणः = भगवान् बादरायण व्यास;
- अस्ति = मानते हैं (अधिकार है);
- हि = क्योंकि (श्रुति-प्रमाण विद्यमान है)। सूत्रार्थ: किन्तु भगवान् बादरायण व्यास का मत है कि देवताओं का मधुविद्या आदि उपासनाओं में अधिकार (भाव) विद्यमान है; क्योंकि इसके साधक प्रमाण और हेतु उपलब्ध हैं। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य — तात्पर्य: सूत्र में प्रयुक्त 'तु' शब्द पूर्वपक्ष द्वारा उठाए गए संशय का निरसन करने के लिए है। श्रील व्यासदेव का सुदृढ़ मत है कि देवता भी मधुविद्या तथा अन्य वैदिक उपासनाओं का अनुष्ठान करने में पूर्णतः समर्थ और अधिकारी हैं। सूत्र में 'हि' (क्योंकि) शब्द यह स्पष्ट करता है कि भावी कल्पों में पुनः देवत्व एवं आदित्य-पद प्राप्त करने की अभिलाषा से, वे मूल आदिरूप देवाधिदेव तथा आदित्यान्तर्यामी परब्रह्म की ही उपासना करते हैं। इस उपासना के प्रभाव से उनके भीतर परब्रह्म परमात्मा के नित्य सामीप्य की तीव्र अभीप्सा जाग्रत होती है। इस रीति से देवताओं के लिए मधुविद्या आदि समस्त वैदिक उपासनाओं में प्रवृत्त होना सर्वथा संगत और सम्भव है; क्योंकि शास्त्र यह सिद्ध करते हैं कि परमेश्वर की उपासना ही साध्य (परम प्राप्य) भी है और साधन भी। वर्तमान कल्प में जो वसु, आदित्य आदि पद पर आसीन देवता हैं, वे परमेश्वर को ही वसु तथा आदित्य आदि के मूल-स्वरूप के रूप में ध्यान करते हैं। कल्प के अन्त में वे पुनः वसु एवं आदित्य पदों को प्राप्त करते हैं, तथा अपने हृदयों में अन्तर्यामी रूप से स्थित परमात्मा की उपासना में संलग्न रहते हैं, जो उनके पुनः वसु एवं आदित्य बनने के मूल कारण हैं। तदनन्तर इस भगवत्-उपासना के फलस्वरूप वे अन्ततः मोक्ष (परम पद) को प्राप्त होते हैं। 'आदित्य', 'वसु' तथा अन्य देवताओं के समस्त नाम मूलतः परमात्मा (परब्रह्म) के ही अभिधान हैं। इसकी पुष्टि उपनिषद् के अन्त में आए इस वाक्य से होती है— «य एतं एवं ब्रह्मोपनिषदं वेद» अर्थात् जो पुरुष परब्रह्म के निरूपक इस उपनिषद्-रहस्य को इस प्रकार जानता है, वह परब्रह्म को ही प्राप्त करता है।