गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछान्दोग्योपनिषद् (४.४.४-५) में (जब उनके गोत्र व जाति के विषय में पूछा गया, तब जाबालि ने कहा)— "नाहमेतद् वेदे भो यद्गोत्रोऽहमस्मि" (हे भगवन्! मैं यह नहीं जानता कि मैं किस गोत्र अथवा जाति में उत्पन्न हुआ हूँ)। इन सत्यपूर्ण वचनों ने महर्षि गौतम को यह विश्वास दिला दिया कि जाबाल शूद्र नहीं हैं। तदनन्तर गौतम ऋषि ने कहा— "नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगाः" (अर्थात्: कोई अब्राह्मण ऐसा सत्य बोलने में समर्थ नहीं हो सकता। हे सौम्य! समिधा ले आओ, मैं तुम्हारा उपनयन-संस्कार करूँगा; क्योंकि तुम सत्य से विचलित नहीं हुए)। गुरु गौतम का यह आचरण प्रमाणित करता है कि केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही संस्कारों के अधिकारी हैं; शूद्र इसके अधिकारी नहीं हैं। ॥ सूत्र ३८ ॥ श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ॥ ३८ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: श्रवण-अध्ययन-अर्थ-प्रतिषेधात् — (शूद्रों के लिए वेदों के) श्रवण, अध्ययन और उसके अर्थ-ज्ञान का निषेध होने के कारण, स्मृतेः — स्मृतियों में (प्रतिपादित होने से), च — और भी। सूत्रार्थ: स्मृतियों में शूद्रों के लिए वेदों के श्रवण, अध्ययन तथा उनके अर्थ-ज्ञान का स्पष्ट प्रतिषेध किया गया है, अतः शूद्रों को ब्रह्मविद्या/वेदाधिकार प्राप्त नहीं है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित भाष्य/तात्पर्य: स्मृति-शास्त्र का कथन है— "पद्वु ह वा एतच्छ्मशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रसमीपे नाध्येतव्यम्" (अर्थात् शूद्र साक्षात् पादचारी श्मशान के समान है, अतः शूद्र के समीप वेद का अध्ययन नहीं करना चाहिए)। स्मृति में यह भी कहा गया है— "तस्माच्छूद्रो बहुपशुरयज्ञीयः" (अर्थात् शूद्र पशु-तुल्य है और वह वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान करने के अयोग्य है)। इन निषेधों के कारण शूद्र वेदों के श्रवण का अधिकारी नहीं है। जब उसे वेद-श्रवण का ही अधिकार नहीं है, तो उसके लिए वेदों का अध्ययन, उनके अर्थ का अवबोध, अथवा वेदोक्त यज्ञों एवं तपस्याओं का अनुष्ठान करना सर्वथा असम्भव है। ये सभी कार्य उसके लिए निषिद्ध हैं। स्मृति-शास्त्र कहता है— "नाग्निर्न यज्ञः शूद्रस्य तथैवाध्ययनं कुतः। केवलैव तु शुश्रूषा त्रैवर्णिकानां विधीयते॥" (अर्थात् शूद्र के लिए न तो आधान-योग्य वैदिक अग्नि है और न ही यज्ञ का अधिकार; फिर स्वाध्याय तो सम्भव ही कहाँ है? उसका एकमात्र कर्तव्य तीनों उच्च वर्णों की निष्कपट सेवा करना विहित है)। स्मृति का अन्य वचन भी है— "वेदाक्षरविचारणे शूद्रः पतति तत्क्षणात्" (अर्थात् वेदों के अक्षरों का विचार या अध्ययन करने पर शूद्र तत्काल पतित हो जाता है)। यद्यपि विदुर आदि कतिपय महानुभाव शूद्र-योनि में उत्पन्न हुए, तथापि वे पूर्वजन्मों के पुण्यों के प्रभाव से परिपूर्ण दिव्य तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर परम पद को प्राप्त हुए। पुराणों एवं अन्य सात्त्विक इतिहास-ग्रन्थों के श्रवण एवं अवबोधन से शूद्र तथा अन्य सभी जीव भी मुक्त हो सकते हैं। मानवों में उच्चता अथवा नीचता का वास्तविक निर्धारण उनके जीवन के अन्तिम आध्यात्मिक फल और भगवत्प्राप्ति से ही होता है।