गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिकरण ९ : कम्पनाधिकरणम् विषय : कठोपनिषद् (२.३.२) में वर्णित 'वज्र' शब्द परमब्रह्म (परमेश्वर) का वाचक है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य - भूमिका : इस प्रकार प्रासङ्गिक विचार (अवान्तर विषय) की समाप्ति के अनन्तर सूत्रकार पुनः प्रस्तुत (मूल) प्रकृत विषय का विचार करते हैं। विषयवाक्य (कठोपनिषद् २.३.२) : यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ श्रुत्यर्थ (हिन्दी अनुवाद) : "यह सम्पूर्ण जगत् जो कुछ भी विद्यमान है, उस परम प्राणस्वरूप (परमेश्वर) से निःसृत होकर उसी के भय से कम्पित (चेष्टारत) होता है। वह उद्यत (उठाए हुए) वज्र के समान महाभयस्वरूप है; जो इस प्रकार उसे जानते हैं, वे अमर (मुक्त) हो जाते हैं।" संशय : यहाँ 'वज्र' शब्द इन्द्र के आयुध प्रसिद्ध वज्र का वाचक है अथवा परमपुरुषोत्तम भगवान् (परब्रह्म) का? पूर्वपक्ष : यहाँ 'वज्र' शब्द से जगत् में कम्पन (भय) का कारण वर्णित है, तथा इस वज्र के ज्ञान से जो मुक्ति (अमृतत्व) की प्राप्ति कही गई है, वह केवल औपचारिक या गौण अर्थवाद मात्र है; अतः 'वज्र' शब्द का अर्थ प्रसिद्ध आयुध विशेष ही स्वीकार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त यहाँ 'प्राण' शब्द का अर्थ वायु (श्वास) न होकर 'रक्षक' भी नहीं माना जा सकता, इसलिए इस सन्दर्भ में 'वज्र' शब्द परमेश्वर का वाचक नहीं हो सकता। 'उद्यतं वज्रम्' (उठाया हुआ वज्र) यह पद भी परमेश्वर-परक अर्थ का बाधक है, अतः यहाँ 'वज्र' का अर्थ अशनि (इन्द्र का वज्र) ही है। सिद्धान्त : इस पूर्वपक्ष के निराकरण में सूत्रकार निम्नलिखित सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं— ब्रह्मसूत्र १.३.३९ : कम्पनात् ॥ ३९ ॥ पदच्छेद : कम्पनात् (हेतौ पञ्चमी)। सूत्रार्थ : सम्पूर्ण जगत् का कम्पन (परमेश्वर के भय से चेष्टा करना) वर्णित होने के कारण यहाँ 'वज्र' और 'प्राण' शब्द से परब्रह्म परमेश्वर का ही ग्रहण होता है। भाष्य (हिन्दी व्याख्या) : चूँकि सम्पूर्ण चराचर जगत् उस परम तत्त्व के ही अनुशासन व भय से कम्पित होकर अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त होता है, अतः यहाँ 'वज्र' शब्द परमात्मा का ही वाचक है, किसी भौतिक अस्त्र का नहीं।