गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंशय-निराकरणम् / पूर्वपक्ष-समाधानम् कहीं श्रुति यह प्रतिपादन करती है कि अग्नि से जल की उत्पत्ति होती है, और कहीं अन्य प्रकार से वर्णन मिलता है। इस प्रकार उत्पन्न हुए संशय के निवारणार्थ सूत्रकार अग्रिम सूत्र प्रस्तुत करते हैं— ॥ ब्रह्मसूत्रम् २.३.१० ॥ सूत्रम्: आपः ॥ १० ॥ पदच्छेदः: आपः — जल (प्रथमा बहुवचनम्)। सूत्रार्थः: (तेज से) जल उत्पन्न होता है। श्रील बलदेवविद्याभूषण-विरचितं गोविन्दभाष्यम् (भावानुवाद एवं व्याख्या) पूर्वसूत्र से 'अतस्तथा ह्याह' (उससे ही, क्योंकि श्रुति ऐसा ही कहती है) इस पदसमूह की यहाँ अनुवृत्ति होती है। इसका अर्थ यह है कि तेज (अग्नि) से ही जल की उत्पत्ति होती है; क्योंकि श्रुति-शास्त्र स्पष्ट रूप से ऐसा ही विधान करता है। श्रुति-प्रमाणम् (१): छान्दोग्योपनिषत् (६.२.३) में कहा गया है— "तदपोऽसृजत" अनुवाद: "उस (तेज) ने जल की सृष्टि की।" श्रुति-प्रमाणम् (२): तैत्तिरीयोपनिषत् (२.१) में भी कहा गया है— "अग्नेरापः" अनुवाद: "अग्नि से जल उत्पन्न हुआ।" ये दोनों श्रुति-वाक्य सर्वथा स्पष्ट हैं और इनके लिए किसी विस्तृत व्याख्या की आवश्यकता नहीं है। तेज से जल की उत्पत्ति का प्रत्यक्ष लौकिक दृष्टान्त छान्दोग्योपनिषद् के अग्रिम वचनों में इस प्रकार समझाया गया है— श्रुति-प्रमाणम् (३): "तस्माद्यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते" हिन्दी-भावार्थ: "इसी कारण जब कभी कोई मनुष्य शोक से सन्तप्त होता है (मनस्ताप रूपी तेज से) अथवा पसीने से युक्त होता है (शारीरिक ताप रूपी तेज से), तब उस तेज (गर्मी) से ही जल (अश्रु अथवा स्वेद/पसीना) उत्पन्न होता है।"