गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबृहदारण्यकोपनिषद् (४.३.३०) के निम्नलिखित वचन — यद्वै तन्न विजानाति विजानन्वै तद्विज्ञेयं न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञानात् विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद् विजानीयात् ॥ "सुषुप्ति की अवस्था में आत्मा चेतन और अचेतन दोनों प्रतीत होती है। आत्मा सर्वदा चेतन है, और चेतना इससे कभी पृथक् नहीं हो सकती, क्योंकि आत्मा और उसकी चेतना का कभी विनाश नहीं हो सकता। फिर भी, सुषुप्ति की अवस्था में आत्मा के सम्मुख कोई ऐसा विषय उपस्थित नहीं रहता जिसका वह भान करे।" जब चेतना के ग्रहण करने हेतु कोई बाह्य विषय नहीं होता, तब चेतना सुप्त (अव्यक्त) रहती है। अतः सुषुप्ति में चेतना सुप्त रहती है। जब इन्द्रियों का विषयों के साथ सम्पर्क होता है, तब चेतना अभिव्यक्त हो जाती है। यदि यह सुषुप्ति के समय सुप्तावस्था में विद्यमान न होती, तो जाग्रत् अवस्था में चेतना स्वयं अभिव्यक्त नहीं हो सकती थी, जैसे जन्म से नपुंसक व्यक्ति युवावस्था के आरम्भ में पौरुष की अभिव्यक्ति नहीं कर सकता। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा अणु-परिमाण, ज्ञानस्वरूप और नित्य ज्ञाता (चेतन) है। अब सूत्रकार सांख्य मतावलम्बियों के सिद्धान्त का निराकरण करते हैं। संशय : क्या जीवात्मा केवल ज्ञानस्वरूप ही है और कुछ नहीं? क्या जीवात्मा सर्वव्यापी (विभु) है? पूर्वपक्ष : जीवात्मा सर्वव्यापी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसके कर्मों का फल सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। यदि यह अणु-परिमाण होता, तो आत्मा शरीर के भिन्न-भिन्न अङ्गों में उत्पन्न सुख-दुःख की अनुभूति करने में असमर्थ रहता। यदि यह मध्यम परिमाण वाला होता, तो नित्य न होता। अतः जीवात्मा को सर्वव्यापी ही मानना चाहिए। सिद्धान्त : अधोलिखित शब्दों में सूत्रकार यथार्थ सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं — सूत्र ३० नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वाऽन्यथा ॥ ३० ॥ नित्य — नित्य, सदा; उपलब्धि — प्रतीति (ज्ञान); अनुपलब्धि — अप्रतीति (अज्ञान); प्रसङ्गः — प्रसङ्ग, आपत्ति; अन्यतर — दोनों में से किसी एक का; नियमः — नियम, प्रतिबन्ध; वा — अथवा; अन्यथा — अन्यथा (अन्य प्रकार मानने पर)। अन्यथा (आत्मा को विभु मानने पर) नित्य उपलब्धि, नित्य अनुपलब्धि, अथवा