गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीगोविन्दभाष्यम् (श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचितम्) ॥ [ पूर्वपक्ष-निरासः — जीवस्याणुत्व-सिद्धान्तः ] भाष्य-सार (संस्कृत): यदि जीवात्मा केवलं चिद्रूपः सर्वगतश्चाभ्युपगम्येत, तर्हि सर्वदा चैतन्यं वा स्यात्, सर्वथाऽचैतन्यं वा, अन्यतरस्यैव वा परिमितः सद्भावः प्रसज्येत। लोके हि चैतन्याचैतन्ययोर्द्वयोरप्युपलब्धिः सर्वसिद्धा वर्तते। यदि चिन्मात्रः सर्वव्यापी चैक एवात्मा सर्वस्य हेतुरिष्यते, तर्हि युगपत् सर्वत्र सर्वैः चैतन्यमचैतन्यं चोपलभ्येत। केवलचैतन्यहेतुत्वे कस्यापि कदापि सुषुप्त्यादिषु अचैतन्यं न स्यात्; केवलाचैतन्यहेतुत्वे च कस्यापि कदापि चैतन्यं नोपपद्येत। इन्द्रियसंयोगादौ सति चैतन्यं तदभावे चाचैतन्यमिति चेत्, तन्न; सर्वगतस्यात्मनः सर्वैरिन्द्रियैः सह नित्यसंयोगाविशेषात्। किञ्च, जीवस्य विभुत्वे सर्वजीवगत-सुखदुःखादीनां सांकर्यं स्यात्, भोगनियमः, कर्मफलव्यवस्था, बन्धमोक्षव्यवस्था च विनश्येत्। अतः प्रतिशरीरं भिन्नः, अणुपरिमाणश्चायं जीवात्मा इति सिद्धान्तः सुदृढो भवति। अणुरपि सन् स्वगुणभूतेन ज्ञानेन सकलशरीरं व्याप्य सुखदुःखाद्युपलब्धिं करोति यथा प्रदीपः प्रभारूपेण सर्वं गृहं प्रकाशयति। हिन्दी-अनुवाद: यदि जीवात्मा केवल चैतन्य-स्वरूप और सर्वव्यापी (विभु) होता, तो वह सर्वदा चैतन्ययुक्त रहता अथवा सर्वदा अचेतन ही रहता। अथवा उन दोनों में से किसी एक का सीमित अस्तित्व ही सम्भव हो पाता। इसका तात्पर्य यह है कि संसार में चेतनता और अचेतनता (सुषुप्ति, मूर्च्छा आदि) दोनों की प्रत्यक्ष अनुभूति सभी को होती है। यदि इसका कारण केवल चिन्मात्र और सर्वव्यापक आत्मा होता, तो सम्पूर्ण विश्व में प्रत्येक क्षण चेतनता और अचेतनता की अनुभूति एक साथ होनी चाहिए थी। यदि वह सर्वव्यापी आत्मा केवल चेतनता का कारण होता, तो कोई कभी अचेतन नहीं होता; और यदि केवल अचेतनता का कारण होता, तो कोई कभी चेतन नहीं होता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि इन्द्रियों के सम्पर्क से चैतन्य और असम्पर्क से अचैतन्य होता है, क्योंकि सर्वव्यापक होने पर इन्द्रियों से नित्य संयोग रहेगा। इसके अतिरिक्त, यदि जीवात्मा विभु होता, तो एक के सुख-दुःख का अनुभव सभी को एक साथ होने लगता। ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत कर्म, व्यक्तिगत भोग और व्यक्तिगत अदृष्ट की व्यवस्था ही छिन्न-भिन्न हो जाती। अतः जीवात्मा सर्वव्यापी नहीं है, अपितु प्रति-शरीर भिन्न और अणु-परिमाण (सूक्ष्म) है। अणु होने पर भी आत्मा अपने धर्मभूत ज्ञान के द्वारा सम्पूर्ण देह में व्याप्त होकर सभी सुख-दुःखादि संवेदनों को ग्रहण करता है।
॥ अथ चतुर्दशं कर्त्राधिकरणम् (१४) ॥
अधिकरण-विषय: जीवात्मनः कर्तृत्व-विचारः (जीवात्मा कर्ता है या नहीं?) श्रील बलदेव विद्याभूषण-कृत अवतरणिका (भूमिका): अथेदानीं सूत्रकारो जीवात्मनः कर्तृत्वं विचारयति। तैत्तिरीयोपनिषदि (२।५।१) श्रूयते— श्रुति-प्रमाणम्: "विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च ॥" (तैत्तिरीयोपनिषद् २।५।१) श्रुत्यर्थ एवं हिन्दी-व्याख्या: 'विज्ञानम्' अर्थात् विज्ञानमयः चेतनः जीवात्मा, यज्ञं तनुते (यज्ञादि वैदिक कर्मों का विस्तार/अनुष्ठान करता है) तथा लौकिक कर्माणि अपि तनुते (लौकिक कर्मों का भी सम्पादन करता है)। संशय: किमिदं कर्तृत्वं प्रकृतेः (बुद्धेः) वा, उत चेतनस्य जीवात्मन एव? पूर्वपक्ष: सांख्य-मतानुसारिणः प्राहुः—प्रकृतेर्गुणानामेव कर्तृत्वं न तु पुरुषस्य, पुरुषस्तु केवलम् अकर्ता साक्षी निर्लेपश्चेति। सिद्धान्त-सूत्रम्: ॥ कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ॥ २।३।३३ ॥ सूत्रार्थ: जीवात्मा ही वास्तविक कर्ता है, क्योंकि ऐसा मानने पर ही विधि-निषेधात्मक शास्त्रों की सार्थकता (शास्त्रार्थवत्त्व) सिद्ध होती है। यदि जड़ा प्रकृति या बुद्धि कर्ता होती, तो चेतन जीव के लिए उपदिष्ट 'यजेत', 'उपासीत' आदि शास्त्र-वचन व्यर्थ हो जाते।