गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यष्टि-जीवात्माओं के भिन्न-भिन्न स्वभावों की व्याख्या एक भिन्न प्रकार से की जानी चाहिए। ये भेद विभिन्न अदृष्टों (प्रारब्धों) के कारण विद्यमान हैं। सूत्र में प्रयुक्त "च" (और) शब्द यह संकेत करता है कि ये भेद प्रत्येक क्षण विद्यमान रहते हैं। (पूर्वपक्ष:) यहाँ कोई आपत्ति कर सकता है: क्या यह ऐसा नहीं है कि ये भेद भिन्न-भिन्न प्रदेशों (वातावरणों) के कारण उत्पन्न होते हैं, जैसे स्वर्गलोक, पृथ्वी अथवा अन्य स्थानों का परिवेश? (सिद्धान्त:) इसके उत्तर में सूत्रकार महर्षि व्यास कहते हैं, "नहीं, ऐसा नहीं है।" वे निम्नलिखित व्याख्या प्रस्तुत करते हैं— सूत्र ५१ प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॥ ५१ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: प्रदेशात् — विभिन्न वातावरण अथवा स्थान-भेद से; इति चेत् — यदि ऐसा कहें तो; न — ऐसा नहीं है; अन्तर्भावात् — क्योंकि उसी में अन्तर्भाव होने से (अन्य कारण विद्यमान होने से)। सरलार्थ: यदि यह कहा जाए कि जीवों का यह भेद वातावरण अथवा स्थान-भेद के कारण है, तो उत्तर है: नहीं, क्योंकि इसका दूसरा ही कारण है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित 'गोविन्द भाष्य' का तात्पर्य: यहाँ निर्दिष्ट अन्य कारण जीवात्माओं के भिन्न-भिन्न अदृष्ट (कर्मफल तथा वासनाएँ) हैं। यहाँ के वैषम्य को केवल भिन्न वातावरणों के अधीन नहीं माना जा सकता, क्योंकि एक ही परिवेश अथवा वातावरण में रहने वाले जीवों में भी प्रायः महान् भेद और विषमताएँ परिलक्षित होती हैं। पाद ४ (चतुर्थ पाद) मङ्गलाचरणम् (प्रार्थना) त्वज्जाताः कलितोत्पाताः मत्प्राणाः सन्त्यमित्रभित् । एतान् शाधि तथा देव