भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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बृहदारण्यकोपनिषदि (१.५.३) श्रूयते— "स एष वायुः पञ्चविधः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानः" इति। (अनुवादः—वह यह वायु पाँच प्रकार का है: प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान।) संशयः—किमेते अपानादयः पञ्च प्राणात् पृथग्भूताः, उत प्राणस्यैव वृत्तिविशेषाः? (संशयः—क्या अपान आदि ये पाँच प्राण से भिन्न तत्त्व हैं अथवा केवल प्राण के ही कार्य-भेद/वृत्ति-भेद हैं?) पूर्वपक्षः—नाम-कर्म-भेदात् पृथक्त्वमेवेति प्राप्ते। (पूर्वपक्षः—नाम और कार्य भिन्न-भिन्न होने के कारण ये पृथक् तत्त्व ही हैं।) सिद्धान्तः—अत्रोच्यते सूत्रकारेण सिद्धान्तवाक्यम्— सूत्र १२ पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते ॥ १२ ॥ पदच्छेदः—पञ्चवृत्तिः, मनः-वत्, व्यपदिश्यते। पदविभागार्थः— पञ्च—पञ्चसंख्याकाः; वृत्तिः—वृत्तयः यस्य सः; मनः-वत्—यथा मनः; व्यपदिश्यते—कथ्यते श्रुत्यादिषु। सूत्रार्थः—यथा मनसः पञ्च वृत्तयः, तथैव प्राणस्यापि पञ्च वृत्तय एव व्यपदिश्यन्ते। (हिन्दी अनुवादः—जैसे मन की पाँच वृत्तियाँ मानी जाती हैं, वैसे ही प्राण की भी पाँच वृत्तियाँ ही कही जाती हैं।) श्रीमद्बलदेवविद्याभूषणविरचितं गोविन्दभाष्यम् (तात्पर्यम्)— प्राणस्त्वेक एव, स च हृदय-गुदादिषु पृथक् स्थानेषु वर्तमानः पञ्चविधवृत्तिभेदेन व्यपदिश्यते। न हि वृत्तिभेदात् वस्तुभेदो भवति, तस्मात् भिन्नाभिधानमपि वृत्तिभेदादेव प्रयुज्यते, न तु स्वरूपभेदात्। तथा च बृहदारण्यकोपनिषदि (१.५.३) श्रुतिराह— "प्राणोऽपानो व्यान उदानः समान इति। एतत्सर्वं प्राण एव।" (हिन्दी भावार्थः—प्राण वस्तुतः एक ही है, यद्यपि हृदय आदि विभिन्न स्थानों में रहने के कारण वह पाँच प्रकार की वृत्तियों को धारण करता है। अतः ये प्राण के कार्य-भेद हैं, स्वरूपतः भिन्न प्राण नहीं। इसीलिए वृत्ति-भेद से विभिन्न नाम प्रयुक्त होते हैं। श्रुति भी स्पष्ट कहती है कि प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान—यह सब प्राण ही है।)