भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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मनः षष्ठानीन्द्रियाणि (भगवद्गीता १५.७) "मन छह इन्द्रियों में से एक है।" भगवान् श्रीकृष्ण भी यह उद्घोष करते हैं (भगवद्गीता १०.२२): इन्द्रियाणां मनश्चास्मि "इन्द्रियों में मैं मन हूँ।" सूत्रम् १९ वैलक्षण्याच्च ॥ २।४।१९ ॥ वैलक्षण्यात् — विलक्षणता (भिन्न गुण-धर्म) होने के कारण; च — भी। भिन्न गुण-धर्म (वैलक्षण्य) होने के कारण भी (प्राण और इन्द्रियों में भेद सिद्ध होता है)। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य-तात्पर्य: सुषुप्ति (गहरी निद्रा) की अवस्था में मुख्य प्राण सक्रिय रहता है, किन्तु कर्ण आदि बाह्य इन्द्रियाँ क्रियाशील नहीं रहतीं। मुख्य प्राण शरीर तथा इन्द्रियों का पोषण एवं संधारण करता है, जबकि इन्द्रियाँ केवल ज्ञान एवं कर्म के सम्पादन हेतु साधन या उपकरण मात्र हैं। इस प्रकार मुख्य प्राण तथा इन्द्रियों के स्वभाव और कार्यों में स्पष्ट वैलक्षण्य है। अतएव जिस प्रकार जीवात्माएँ परमपुरुष भगवान् पर आश्रित रहती हैं, उसी प्रकार इन्द्रियाँ भी मुख्य प्राण के अधीन और आश्रित हैं। अधिकरणम् १२: (संज्ञाकृतिकरणाधिकरणम् / संज्ञापूर्तिकरणम्) प्रापञ्चिक जगत् के विविध नाम एवं रूपों की सृष्टि परमपुरुष भगवान् द्वारा की जाती है श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा अवतारिका (भूमिका)