भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

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सूत्रस्थ 'अपि' शब्द यह संकेत करता है कि सुषुप्ति (प्रगाढ़ स्वप्नरहित निद्रा) तथा मूर्च्छा की अवस्था भी परमपुरुष भगवान् द्वारा ही रची जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि श्रुति-शास्त्र यह प्रमाणित करता है कि परमपुरुष भगवान् ही समस्त वस्तुओं के स्रष्टा (सर्वकर्ता) हैं। अधिकरण ४ परमपुरुष भगवान् ही सुषुप्ति के विधाता हैं श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा अवतरणिका अब सुषुप्ति की अवस्था पर विचार किया जाएगा। श्रुति-शास्त्र निम्नलिखित प्रसंगों में सुषुप्ति की अवस्था का वर्णन करता है। छान्दोग्य उपनिषद् (८.६.३) में कहा गया है: आसु तदा नाडीषु सुप्तो भवति "नाड़ियों में प्रविष्ट होकर जीवात्मा शयन करता है।" बृहदारण्यक उपनिषद् (२.१.१९) में कहा गया है: ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते "हृदय को आवेष्टित करने वाले पुरीतत् (झिल्ली) में प्रवेश कर वह शयन करता है।" बृहदारण्यक उपनिषद् (२.१.१७) में कहा गया है: य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते "हृदय के भीतर जो यह दहराकाश है, उसमें जीवात्मा शयन करता है।" इसी प्रकार के अन्य अनेक मन्त्र भी उद्धृत किए जा सकते हैं। यहाँ 'हृदय के भीतर आकाश' साक्षात् परमपुरुष भगवान् ही हैं। इस प्रकार श्रुति-शास्त्र यह प्रतिपादित करता है कि सुषुप्ति तब प्रकट होती है जब जीवात्मा नाड़ियों में, हृदय को आवेष्टित करने वाली पुरीतत् में तथा परमपुरुष भगवान् में प्रविष्ट होता है।