गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीब्रह्मसूत्रम् — गोविन्दभाष्यम् ॥ तृतीयोऽध्यायः — द्वितीयः पादः (३.२) ॥ तदभावाधिकरणम् (अधिकरणम् ३) ॥ संशयः — किं तदेकैकस्मिन् सुषुप्तिः, उत समुच्चितेष्विति? (संशय: क्या जीवात्मा इन तीनों स्थानों में से किसी एक में प्रवेश करता है, अथवा इन सभी में सम्मिलित रूप से प्रवेश करता है?) पूर्वपक्षः — "तुल्यार्थास्तु विकल्पेरन्" इति न्यायेनैकैकस्मिन् सा स्यात्। (पूर्वपक्ष: जीवात्मा इन तीनों में से किसी भी एक स्थान में प्रवेश कर सकता है, क्योंकि ये तीनों स्थान सुषुप्ति के लिए समान रूप से उपयुक्त हैं।) न्यायशास्त्रे (मीमांसाशास्त्रे) उक्तम् — तुल्यार्थास्तु विकल्पेरन् ॥ (मीमांसासूत्रम् १२.२.३४) ("एक ही प्रयोजन वाले समान साधनों में विकल्प होता है अर्थात् उनमें से किसी एक का चयन किया जाता है।") सिद्धान्तः — तत्र सूत्रकारः स्वसिद्धान्तं प्रकटयति — सूत्रम् ७ — तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च ॥ ७ ॥ पदच्छेदः — तत् — तस्य; अभावः — अभावः; नाडीषु — नाडीषु; तत् — तत्; श्रुतेः — श्रुतिशास्त्रात्; आत्मनि — परमात्मनि; च — अपि (पुरीतति च)। सूत्रार्थः — तस्य (जाग्रत् एवं स्वप्न का) अभाव (अर्थात् सुषुप्ति) नाड़ियों में तथा परमात्मा में (एवं पुरीतत् में) समुच्चित रूप से होता है, क्योंकि श्रुति का ऐसा ही विधान है। श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचितं गोविन्दभाष्यम् (भावानुवादसहितम्) — चकारेण पुरीतत्समुच्चयः। अत्र 'च' शब्दः हृदयवेष्टक पुरीतत्-नामक आवरण के समावेश का द्योतक है। 'तदभावः' इत्यनेन प्रबोधस्वप्नयोरभावः सुषुप्तिरुच्यते। 'तदभाव' पद का अर्थ जाग्रत् तथा स्वप्न का अभाव अर्थात् गाढ़ सुषुप्ति की अवस्था है। सा तु नाडीषु पुरीतति परस्मिंश्चात्मनि समुच्चितेषु भवेत्। वह सुषुप्ति नाड़ियों, हृदयवेष्टक पुरीतत् तथा परमपुरुष परमात्मा में सम्मिलित (समुच्चित) रूप से घटित होती है। कुतः? तत्राह — 'तच्छ्रुतेः'। ऐसा क्यों है? सूत्रकार कहते हैं: "तच्छ्रुतेः" अर्थात् श्रुति-प्रतिपादित होने के कारण। श्रुति-शास्त्र इन सभी स्थानों को सामूहिक रूप से सुषुप्ति-स्थान घोषित करता है। अत्र विकल्पकल्पना श्रुतिविरुद्धा; अतः सुषुप्ति के निमित्त इनमें से किसी एक स्थान के चयन का विकल्प मानना श्रुति-वचनों के सर्वथा विपरीत है। श्रुतौ हि सुषुप्तिवर्णने नाडीनां प्राणानां च सहैव निर्देशो दृश्यते। शास्त्रों में सुषुप्ति के वर्णन-प्रसंग में नाड़ियों तथा प्राण (परमात्मा) का सह-निर्देश प्राप्त होता है। तथा च कौषीतकि-उपनिषदि (४.१९) श्रूयते —