गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपनिषद्-श्रुति-प्रमाणम् (मुण्डकोपनिषद् २.२.८) भिद्यते हृदयग्रन्थिश् छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ हिन्दी-अनुवाद: "इस प्रकार उस परावर (सर्वोच्च परमेश्वर) का साक्षात्कार होने पर हृदय की ग्रन्थि खुल जाती है, समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं तथा उसके समस्त संचित एवं क्रियमाण कर्मों का क्षय हो जाता है।" भावार्थ: यहाँ यह अभिप्राय है कि परब्रह्म परमेश्वर के साक्षात्कार (दर्शन) से ही जीव की मुक्ति होती है। पूर्वपक्ष: यहाँ कोई शङ्का कर सकता है: क्या शास्त्र यह नहीं कहते कि "वैदिक कर्मों के अनुष्ठान से मुक्ति प्राप्त होती है"? अथवा क्या शास्त्र यह नहीं कहते कि "वैदिक कर्मों के अनुष्ठान और तत्त्वज्ञान दोनों के समुच्चय से मुक्ति प्राप्त होती है"? अतः आपका यह कथन (कि केवल ज्ञान/दर्शन से मुक्ति होती है) शास्त्रों से विरुद्ध है। सिद्धान्त-समाधान: यदि ऐसा पूर्वपक्ष उपस्थित किया जाए, तो सूत्रकार (महर्षि बादरायण) निम्नलिखित उत्तर देते हैं— ब्रह्मसूत्रम् — ३.३.५० सूत्र ५०: श्रुत्यादिबलीयस्त्वाच्च न बाधः ॥ ५० ॥ पदच्छेद एवं पद-अर्थ: श्रुति = श्रुति-शास्त्र; आदि = आदि (तथा लिङ्ग आदि प्रमाण); बलीयस्त्वात् = अधिक बलवान् (प्रबल) होने से; च = और; न = नहीं; बाधः = बाध (खण्डन)। सूत्रार्थ: और (केवल ज्ञान से मुक्ति का) बाध नहीं हो सकता, क्योंकि श्रुति आदि प्रमाण अधिक बलवान् हैं। श्रील बलदेवविद्याभूषण-विरचितं गोविन्दभाष्यम् (तात्पर्य): श्रुति-शास्त्र का यह उद्घोष कि "अपरोक्ष ज्ञान से ही मुक्ति प्राप्त होती है", पूर्वपक्षी द्वारा उद्धृत दो शास्त्र-वचनों से खण्डित नहीं किया जा सकता। ऐसा क्यों है? क्योंकि सूत्र कहता है: "श्रुत्यादिबलीयस्त्वात्" (क्योंकि श्रुति-शास्त्रों तथा अन्य प्रमाणों की प्रामाणिकता अधिक प्रबल है)। इसका तात्पर्य यह है कि श्वेताश्वतरोपनिषद् (३.८) के वचन ("तमेव विदित्वाति मृत्युमेति...") तथा अन्य श्रुति-वाक्यों की प्रामाणिकता इतर प्रमाणों की अपेक्षा सर्वथा बलवती है। सूत्र में प्रयुक्त 'आदि' शब्द सूचित करता है कि ऐसे अन्य श्रुति-वाक्य भी विद्यमान हैं, जहाँ यह सत्य साक्षात् अथवा परोक्ष रूप से प्रतिपादित हुआ है। शास्त्रों में कहा गया है: