गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रोऽश्वमेधाच्छतं इष्ट्वापि राजा ब्रह्माणमीड्यं समुवाचोपसन्नः । न कर्मभिर्न धनैर्नापि चान्यैः पश्येत् सुखं तेन तत्त्वं ब्रवीहि ॥ (भावानुवाद: सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न करने के उपरान्त भी राजा इन्द्र ने स्तुत्य ब्रह्माजी के समीप उपस्थित होकर निवेदन किया— "न वैदिक कर्मकाण्डों से, न प्रचुर धन से, और न ही किसी अन्य साधन से मुझे वास्तविक सुख की प्राप्ति हुई है; अतः कृपा करके मुझे वह परम तत्त्व बतलाइए जिससे मैं वास्तविक सुख/आनन्द का दर्शन कर सकूँ।") श्रुतौ चोक्तम्— नास्त्यकृतः कृतेन ॥ (मुण्डकोपनिषद् १।२।१२) (अर्थात्: जो अकृत अर्थात् नित्य-अजन्मा परब्रह्म है, वह कृत अर्थात् कर्म-अनुष्ठानों से प्राप्त नहीं हो सकता।) पूर्वपक्षी द्वारा उद्धृत छह सूत्रों (३.४.२–७) के आक्षेपों का समाधान स्वयं सूत्रकार महर्षि बादरायण आगे के सूत्रों (३.४.८–१४) में करेंगे। सूत्र में "आदि" शब्द का तात्पर्य है कि इस सिद्धान्त के पोषक अनेक अन्य श्रुति-प्रमाण भी विद्यमान हैं। तथा "च" शब्द यह द्योतित करता है कि अनेक श्रुतियाँ यह सिद्ध करती हैं कि ब्रह्मविद्या समस्त पूर्व सञ्चित कर्म-संस्कारों का समूल उच्छेद कर देती है। पूर्वपक्षी द्वारा प्रस्तुत "तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते" इत्यादि वचनों का परिहार सूत्रकार स्वयं सूत्र ३.४.११ में करेंगे। अतः यह सिद्धान्त सुप्रतिष्ठित हुआ कि ब्रह्मविद्या ही मोक्ष रूपी परम पुरुषार्थ की साक्षात् और एकमात्र हेतु है। अधिकरणम् २४ : भक्त/सन्त-पूजन-अधिकरणम् श्रीलबलदेवविद्याभूषण-विरचित गोविन्दभाष्य-अवतरणिका: अब इस सिद्धान्त का निरूपण किया जाता है कि भगवद्भक्त सन्तों की सेवा-अर्चना से मुक्ति की प्राप्ति होती है। तैत्तिरीयोपनिषदि (१।११।२) श्रूयते— अतिथिदेवो भव ॥ (अनुवाद: अतिथि को साक्षात् देवस्वरूप मानकर उसकी सेवा-सत्कार करो।)