गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछान्दोग्योपनिषद् (३.१८.१) के निम्नलिखित वचनों में भगवान् की उपासना वर्णित है: मनो ब्रह्मेत्युपासीत "मनुष्य को मन को ब्रह्म मानकर उपासना करनी चाहिए।" संशय: क्या किसी को मन का ध्यान परम पुरुषोत्तम भगवान् के साथ अभिन्न रूप में करना चाहिए? पूर्वपक्ष: क्योंकि शास्त्र प्रतिपादित करते हैं कि मन और परम पुरुषोत्तम भगवान् भिन्न नहीं हैं, अतः इस प्रकार का ध्यान किया जाना चाहिए। सिद्धान्त: निम्नलिखित शब्दों में सूत्रकार अपना निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। सूत्र ४ न प्रतीके न हि सः न—नहीं; प्रतीके—प्रतीक (अंश) में; न—नहीं; हि—निश्चय ही; सः—वह। प्रतीक में नहीं। वह वह नहीं है। तात्पर्य श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि मन अथवा अन्य वस्तुएँ जो केवल अंश (प्रतीक) हैं, वे स्वयं परमेश्वर से अभिन्न हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर अपने अंशों से अभिन्न नहीं हैं। अपितु, परमेश्वर ही मन के आधार और विश्राम-स्थल हैं। श्रीमद्भागवत (११.२.४१) में कहा गया है: खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन् सरित्समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत्किं च भूतं प्रणमेदनन्यः