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गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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प्रमाण-श्लोकः (श्रीमद्भागवतम् ११.२.४१) : खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित्समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः ॥ श्लोकार्थ एवं पूर्वपक्ष-निष्कर्ष (हिन्दी अनुवाद) : अनन्य भक्त को किसी भी वस्तु को परम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण से पृथक् नहीं देखना चाहिए। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य एवं अन्य ज्योतिर्मण्डल, समस्त प्राणी, दिशाएँ, वृक्ष-वनस्पतियाँ, नदियाँ तथा समुद्र—अर्थात् जो कुछ भी विद्यमान है, उस समस्त जगत् को श्रीहरि का ही शरीर मानकर अनन्य भाव से प्रणाम करना चाहिए। यहाँ 'हरेः शरीरम्' में प्रथमा विभक्ति को सप्तमी विभक्ति के अर्थ में समझना चाहिए—यही निष्कर्ष है।

अधिकरणम् ४ : ब्रह्मदृष्ट्यधिकरणम् (अव्यक्त / निर्विशेष ब्रह्म विचार) श्रील बलदेवविद्याभूषण-विरचित गोविन्दभाष्य की भूमिका : पूर्व अधिकरण में यह प्रतिपादित किया जा चुका है कि परम पुरुषोत्तम श्रीभगवान् का सर्वव्यापी परमात्मा के रूप में ध्यान करना चाहिए। संशय : क्या परम पुरुषोत्तम भगवान् में अव्यक्त (निर्विशेष) ब्रह्म की दृष्टि करनी चाहिए अथवा नहीं? विषय : अव्यक्त ब्रह्म का निरूपण परम पुरुषोत्तम भगवान् के निरूपण से भिन्न प्रतीत होता है। पूर्वपक्ष : परम पुरुषोत्तम भगवान् को अव्यक्त ब्रह्म से अभिन्न नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि पूर्व में ही उनका सर्वान्तर्यामी परमात्मा के साथ तादात्म्य निश्चित हो चुका है। सिद्धान्त : इस संशय के निवारण हेतु सूत्रकार महर्षि व्यास अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं— सूत्रम् ५ : ॥ ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ॥ ५ ॥ (ब्रह्मसूत्र ४।१।५) पदच्छेदः : ब्रह्म-दृष्टिः, उत्कर्षात्। पदार्थ (शब्दार्थ) : ब्रह्म — परब्रह्म की; दृष्टिः — दृष्टि (भावना, चिन्तन या उपासना); उत्कर्षात् — सर्वोत्कृष्ट अथवा श्रेष्ठ होने के कारण। सूत्रार्थ (हिन्दी अनुवाद) : ब्रह्म ही सर्वोत्कृष्ट तत्त्व है; अतः निकृष्ट में उत्कृष्ट की भावना करना ही शास्त्रोक्त नियम है। अतः उत्कर्ष के कारण सर्वत्र ब्रह्म-दृष्टि ही उपादेय और श्रेष्ठ है।

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