गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिकरणम्: प्राणाध्यक्षप्रवेशाधिकरणम् (प्राणस्य जीवाप्ययः) श्रीलबलदेवविद्याभूषणविरचिता भूमिका (गोविन्दभाष्यम्) अथ छान्दोग्योपनिषदः (६.८.६) एतद्वाक्यं विचार्यते— "प्राणस्तेजसि" ("प्राण तेज में लीन होता है।") संशयः—किम् इन्द्रियमनोविशिष्टः प्राणः साक्षात् तेजस्तत्त्वे लीयते, उत जीवात्मनि (अध्यक्षे) प्रविशति? (संशय: क्या मन और इन्द्रियों से युक्त प्राण सीधे तेजस्तत्त्व में लीन होता है, अथवा जीवात्मा में प्रवेश करता है?) पूर्वपक्षः—"प्राणस्तेजसि" इति छान्दोग्यश्रुतेः प्राणः साक्षात् तेजस्येव लीयते। (पूर्वपक्ष: छान्दोग्योपनिषद् के वचनानुसार प्राण सीधे तेजस्तत्त्व में ही लीन होता है।) सिद्धान्तः—अत्रोच्यते, सूत्रकारः स्वसिद्धान्तं प्रतिपादयति— (सिद्धान्त: इसके समाधान में सूत्रकार अपना निर्णय व्यक्त करते हैं—) सूत्रम् ४ सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ॥ ४ ॥ पदच्छेदः पदार्थश्च— सः — स प्राणः (वह प्राण); अध्यक्षे — देहेन्द्रियाध्यक्षे जीवे (शरीर और इन्द्रियों के स्वामी जीवात्मा में); तत् — तस्य जीवस्य (उस जीवात्मा के); उपगम — अभिसम्पत्तिः/उपगमनम् (निकट आने); आदिभ्यः — आदिश्रुतिनिर्देशेभ्यः (आदि श्रुतिवचनों के कारण)। सूत्रार्थः—वह प्राण अध्यक्ष अर्थात् जीवात्मा में प्रविष्ट होता है, क्योंकि श्रुति में जीवात्मा के प्रति प्राणों के उपगमन (समीप जाने) आदिक का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है। श्रीलबलदेवविद्याभूषणकृतं भाष्यम् (गोविन्दभाष्यम्) अत्र 'सः' इति शब्देन प्राणो गृह्यते, 'अध्यक्षे' इति शब्देन च शरीरेन्द्रियाधिपतिः जीवात्मा उच्यते। (यहाँ 'सः' शब्द से 'प्राण' तथा 'अध्यक्षे' शब्द से 'शरीर और इन्द्रियों का स्वामी जीवात्मा' विवक्षित है।) तस्मात् प्राणः प्रथमं जीवात्मनि लीयते। कस्माद्धेतोः? (अतः प्राण प्रथम जीवात्मा में प्रविष्ट होता है। ऐसा क्यों?) सूत्रकार आह—"तदुपगमादिभ्यः" (तस्योपगमनादिश्रुतिभ्यः)। (सूत्र समाधान करता है—"तदुपगमादिभ्यः" अर्थात् उसके निकट जाने आदि का वर्णन करने वाले श्रुति-प्रमाणों के कारण।) तथाहि बृहदारण्यकोपनिषदि (४.३.३८) श्रूयते—"तमेवंविदं आत्मानं अन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति" इति।