गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिकरणम्: विदुष उत्क्रान्तिः (ज्ञानी जीव का प्रस्थान) श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्दभाष्य की भूमिका अब छान्दोग्योपनिषद् (६.८.६) के विषय में उठने वाले एक संशय पर विचार किया जाता है। संशय: क्या यह प्रसंग तत्त्वज्ञानी जीव के भौतिक शरीर से उत्क्रमण का वर्णन करता है, अथवा उसका जो अज्ञानी (अविद्वान्) है? पूर्वपक्ष: बृहदारण्यकोपनिषद् (४.४.७) में यह कहा गया है: यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्य्- अत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ "जब मनुष्य के हृदय में स्थित समस्त भौतिक कामनाएँ छूट जाती हैं, तब वह मरणधर्मा अमर हो जाता है। और वह इसी लोक में ब्रह्म का साक्षात् उपभोग (अनुभव) करता है।" यहाँ 'अत्र' (इसी लोक में) शब्द यह दर्शाता है कि ज्ञानी पुरुष को इस भौतिक जगत् से उत्क्रमण करने की आवश्यकता नहीं है। वह इसी लोक में आध्यात्मिक जीवन के आनन्द का अनुभव कर लेता है। सिद्धान्त: निम्नलिखित शब्दों में सूत्रकार अपना निर्णय (सिद्धान्त) प्रस्तुत करते हैं। सूत्र ७ समाना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य ॥ ७ ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थ: समाना—समान (एक जैसी); च—और भी; आसृत्युपक्रमात्—नाड़ी-मार्ग (गति) के प्रारम्भ तक; अमृतत्वम्— अमरता (अमृतत्व); च—तथा; अनुपोष्य—(भौतिक देह का) दग्ध न होने पर (आत्यन्तिक विनाश के बिना)। हिन्दी अनुवाद: वास्तव में, मार्ग के आरम्भ (उत्क्रान्ति के प्रारम्भ) तक दोनों (ज्ञानी और अज्ञानी) की गति समान होती है। तथा यहाँ कथित अमृतत्व आत्यन्तिक देह-दाह के बिना ही (सापेक्षिक) है।