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गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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भूतेषु—समस्त भूतों में; तत्—वह; श्रुतेः—श्रुति-शास्त्र के प्रमाण से। समस्त भूतों में, क्योंकि श्रुति-शास्त्र का ऐसा ही विधान है। श्रील बलदेव विद्याभूषण कृत भाष्य/तात्पर्य जीवात्मा समस्त पंचभूतों में प्रवेश करती है। वह केवल अग्नि-तत्त्व में ही प्रवेश नहीं करती। ऐसा क्यों है? बृहदारण्यक उपनिषद् (४.४.५) में कहा गया है: जीवस्याकाशमयो वायुमयस्तेजोमय आपोमयः पृथिवीमयः। "जीवात्मा आकाश, वायु, तेज (अग्नि), जल और पृथ्वी इन भूतों में प्रवेश करती है।" इस प्रकार श्रुति-शास्त्र यह सिद्ध करता है कि जीवात्मा समस्त भौतिक तत्त्वों में प्रवेश करती है। इसका विशेष विवरण अगले सूत्र में दिया गया है। सूत्र ६ नैकस्मिन् दर्शयतो हि ॥ न—नहीं; एकस्मिन्—केवल एक में; दर्शयतः—वे दोनों प्रकट करते हैं; हि—क्योंकि। क्योंकि वे दोनों दर्शाते हैं कि केवल एक तत्त्व में नहीं। श्रील बलदेव विद्याभूषण कृत भाष्य/तात्पर्य ऐसा नहीं मानना चाहिए कि जीवात्मा केवल एक ही तत्त्व में, अर्थात् अग्नि में प्रवेश करती है। यहाँ 'हि' शब्द का अर्थ 'क्योंकि' है। इसका तात्पर्य है, "क्योंकि ऐसा छान्दोग्य उपनिषद् के अध्याय ५, खण्ड ३–१० के प्रश्न और उत्तरों में निरूपित किया गया है।" अधिकरण ५

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