भारतकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

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॥ ब्रह्मसूत्रम् ॥ सङ्कल्पादेव तच्छ्रुतेः ॥ ४.४.८ ॥ पदच्छेदः— सङ्कल्पात्, एव, तत्, श्रुतेः। अन्वयार्थः— (सङ्कल्पात् एव) केवल सङ्कल्प (इच्छा) मात्र से ही, (तच्छ्रुतेः) क्योंकि श्रुति का ऐसा ही वचन है। ॥ श्रीमद्गोविन्दभाष्यम् (श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचितम्) ॥ मुक्तात्मानः केवलं सङ्कल्पादेव सर्वमभिप्रेतं प्राप्नुवन्ति। कुतो ज्ञायते? सूत्रमाह—"तच्छ्रुतेः" इति। छान्दोग्योपनिषदि (८.२.१) श्रूयते— "स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति। तेन पितृलोकेन सम्पन्नो महीयते॥" भावानुवाद (हिन्दी अनुवाद) : मुक्त आत्माएँ केवल अपनी इच्छा (संकल्प) मात्र से ही अपने समस्त अभीष्टों को प्राप्त कर लेती हैं। यह कैसे ज्ञात होता है? सूत्रकार समाधान करते हैं—"तच्छ्रुतेः" अर्थात् श्रुति-शास्त्र के स्पष्ट प्रमाण के कारण। छान्दोग्य उपनिषद् (८.२.१) में कहा गया है: "यदि वह मुक्त पुरुष पितृलोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से ही उसके पितृगण उसके समक्ष उपस्थित हो जाते हैं। उस पितृलोक से सम्पन्न होकर वह महिमान्वित एवं आनन्दित होता है।" इस प्रकार श्रुति-शास्त्र यह प्रमाणित करता है कि मुक्त पुरुष केवल इच्छा मात्र से अपने मनोरथ सिद्ध करता है; यहाँ अन्य किसी कर्म अथवा लौकिक प्रयत्न की आवश्यकता नहीं होती। बृहदारण्यक उपनिषद् (४.५.१३) के पूर्वोक्त उद्धरणों में अन्य शास्त्रीय प्रमाणों से संकोच था, किन्तु इस श्रुति-वाक्य में कोई अन्य प्रतिबन्ध नहीं दिखाई देता। तथापि, ऐसी मुक्ति, जहाँ जीवात्मा का अपना सुख, ऐश्वर्य और प्रभाव ही प्रमुख रहता है, उन रसिक अनन्य भक्तों को प्रिय नहीं लगती जो केवल श्रीभगवान् की निष्काम प्रेमाभक्ति की सेवा-सुधा का आस्वादन करना चाहते हैं। वे ऐसी मुक्ति का अनादर करते हैं। ॥ अथ षष्ठाधिकरणम् ॥ अधिकरण ६ : अनन्याधिपत्यधिकरणम् (मुक्त जीवों के एकमात्र शासक परमेश्वर हैं) ॥ अवतरणिका (श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित) ॥ अधुना सूत्रकारः प्रतिपादयति यत् सर्वसङ्कल्पसिद्धोऽपि मुक्तात्मा केवलं पूर्णपुरुषोत्तमस्य श्रीभगवत एव शरणं गच्छति, नान्यस्य कस्यापि। अवतरणिका अनुवाद : अब सूत्रकार यह दर्शाते हैं कि मुक्त आत्मा, जिसके समस्त संकल्प सिद्ध हो चुके हैं, वह केवल और केवल परमपुरुषोत्तम श्रीभगवान् का ही अनन्य आश्रय ग्रहण करता है। संशयः (Doubt) : किं मुक्तात्मा परमेश्वरादन्यस्यापि कस्यचिच्छासने वर्तते, किंवा केवलं परमेश्वरस्यैवाज्ञां पालयति? संशय का स्वरूप : क्या मुक्त जीवात्मा परमपुरुषोत्तम भगवान् के अतिरिक्त किसी अन्य (इन्द्रादि लोकपालों) के भी शासनाधीन रहता है, अथवा वह केवल एकमात्र परमेश्वर के ही अधीन रहता है? पूर्वपक्षः (Opponent's view) : लोके यथेच्छं विचरन् मुक्तात्मा तत्तल्लोकाधिपतीनां नियमे बद्धः स्यात्। पूर्वपक्ष का मत : विभिन्न लोकों में विचरण करते हुए मुक्त जीव को उन-उन लोकों के अधिपति देवताओं की आज्ञा का पालन करना पड़ सकता है। सिद्धान्तः (Conclusion) : अत एव चानन्याधिपतिः ॥ ४.४.९ ॥ सिद्धान्त भाव : मुक्त पुरुष का अधिपति केवल परब्रह्म परमेश्वर ही है, अन्य कोई भी उस पर शासन नहीं कर सकता।